मन की आवाज

मन की आवाज

By |2018-07-08T11:14:16+00:00July 8th, 2018|Categories: कविता|0 Comments

मन कि आवाज

थी उदासी मन में सुबह मेरे
चाहता था सुनना अंतर्मन की आवाज
लेट गया धरा पर बंद करके आंखे
मन को बहने दिया जो हवा के सहारे
सुन चिड़ियों की चहक भौरों का गुनगुनाना
मिलाया जो सुर औ ताल इनसे मन के सहारे
खुद ब खुद खिलगई मुस्कुराहट होठों पे मेंरे
पर सहसा एक बात दिल को घर कर गई
दिल मे बसी थी जो यादें कहीं फिर से उमड़ गयीं
दिल की बात जो थी मन स्थिति मेरी जाने क्या कर गई
ये यादें थी उनकी जो दिल को एक मीठा दर्द दे गईं
यादों में उनकी ये दिल फिर से मचलने लगा
दिल मेरा सहसा कुछ यूं कहने लगा
न तुम यूँ रूठ के जाना, न मुझसे तुम दूर जाना
ज़िंदगी में सपने हजार दे के न मुझे सताना
जो पल भर को रुठ जाएं हस के एक दूजे को मनाना
रहना संग मेरे तुम सदा…. बनके बहार खुशियों की
जो तुम हो मुस्कुराते मेरे लिए हर रोज है दिवाली
खुशनुमा माहौल से तुम मेरी ज़िंदगी सजाना
बिताए हमने जो हँसी के लम्हे, नहीं हमें है भुलाना
है ज़िन्दगी से अब तमन्ना एक ही
की देखें हर एक सपना आपके ही सहारे
करेंगे पूरे ख्वाब हम दोनों मिलके
न हो पल भर की ज़िन्दगानी अब बिन तेरे
बीते ज़िन्दगी ये तेरे आँचल के ही सहारे
आज फिर से मौसम इतना सुहाना लगा
दिल की नजरों से देखा जो एक पल को तुझे
न तुझमें कोई बेगाना दिखा
आ जाओ …….
तेरा ही इंतज़ार करे है ये दीवाना…….

– ऍम एस पटेल

28/06/2018

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