सुनो,आज कह दूं क्या?

जो कभी नहीं कहा।

कई दफा सोचा कि कह दूं।

पर पास आते ही,तुम्हारी लटों में

उलझ जाते थे मेरे शब्द।

कश्मकश ये कि उलझे शब्दों में कैसे कहूं?

बेचैनी ये कि बिन कहे कैसे रहूं?

चलो आज बोल ही देता हूं।

कुछ राज है जो खोल देता हूं।

लेकिन शुरुआत कहां से हो?

तुम्हारी शफ़क़ होंठों से या,

तुम्हें न छुपाने की कसक से?

या आदि से कहूं मैं

और कह दूं अंत तक।

फिर सोचता हूं कि तय करूं,

तुम्हारा आदि और अंत।

तुम्हारी बातों का,तुम्हारी यादों का आदि और अंत।

अफसोस कि ना बांध सका तुम्हें,

आदि और अंत के बंधनों में।

जानता हूं कि न बांध पाऊंगा तुम्हें सीमाओं में।

ना ही कह सकूंगा जो कभी नहीं कहा।

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