खण्व्य काव्य जीजिविषा…

खण्व्य काव्य जीजिविषा…

खंडकाव्य-जिजीविषा…
(खण्ड-01)

मन ही मन करता रहा मलाल
अद्भुत बीता वह बाल्यकाल |

स्मरण संबंधो का जब आया
मन पूछ उठा क्या क्या सवाल ||

मृगतृष्णा बना रहा बचपन
ना मिला कभी स्नेह उपवन |

सिंचन घन व्योम ने किया जिसे
वह उष्णकटि का वन कानन ||

गति काल कौन अवरुद्ध किया
किसने कब सफल विरुद्ध किया !

जल जल कर जीवन धूनी में
अपना वह गात विशुद्ध किया ||

विधि का विधान कुछ भिन्न हुआ
बन गया तरुण वह बलशाली |

अविदित बढा प्रतिकार हृदय
रणचण्डी थी कुछ मतवाली ||

जिजीविषा-(खण्ड-02…)
……………………………….

नित नित बढता वह जाता था
कोई भी रोक न पाता था |

वह मनमानी कर जाता था
पर कोई टोक न पाता था ||

जिजीविषा चली कुछ द्रूत गति
कुछ स्वप्न बने मनसेज भये |

जो आये उपज प्रतिद्वंदी भी
कुछ योद्धा भी निश्तेज हुए ||

कुछ अपने बने पराए भी
कुछ दुर्लभ प्राप्य बन आये भी |

शत्रु निर्बल दिया शस्त्र डाल
कुछ सगो ने अस्त्र उठाए भी ||

लडता गया उच्छाह उदाम
देखते भर रहे शत्रु तमाम |

पर वह भारी था जन जन पर
बढता ही गया वह अविराम ||

जिजीविषा-(खण्ड-03…)
……………………………….

अपने आये अपनाने को
नाता अपना जतलाने को |

पर रंचमात्र वह डिगा नही
पलटा न लौट के आने को ||

मन में सब बात उभर आई
अत पीडा का सामना हुआ |

कुछ अश्रु ने सिंचित नेत्र किया
क्षंण एक कठिन रमना हुआ ||

उपेक्षित बाल्यकाल का दृष्य
मन में सहसा उभर आया |

मतिहीन देख यूं लगा मुझे
नयनों में रक्त उतर आया ||

जिजीविषा-(खण्ड-04)
……………………………..

आई तरुणाई स्वप्न जगे कुछ अभिनव
संघर्षो की वेदी भी सजी सजाई थी |

चलना था उष्ण तापित रेगिस्तानों मे
जिजीविषा किंतु मन में आग लगाई थी ||

चलता ही गया पथ सहज कठिन
विषयों की बनी परछाई थी |

वह रुका नही क्षंण एक कही
अविराम ही लडी लडाई थी ||

अभिलाषा पहुँची चरम पर थी
लक्तक प्रतीत कठिनाई थी |

प्रतिफल प्राप्य दिखा मन मे
आँखे भी कुछ ललचाई थी ||

विधि ने खेला कुछ अलग खेल
कुछ हुआ अनोखा ऐसा मेल |

शोषित तन मन धन हुआ अनघ
हर वस्तु का हुआ रेलमपेल ||

इस भाँति हुआ शोषण उसका
जिसकी भरपाई हुई नही |

फिर भी मन ग्लानि से वंचित था
तृष की अधिकाई हुई नही ||

जिजीविषा-(खण्ड-05…)
………………………………

अब नव जीवन की आशा थी
मन मे किसलय आँचल डोला |

फिर एक प्रत्याशा जाग उठी
मन ही मन मे मन कुछ बोला ||

परिणय सुत में बध गये साथ
दो पथिक एक पथगामी थे |

विधि ने संशय विष घोल दिया
जिजीविषा चली अनुगामी से ||

था काल कराल सा खडा समय
पर वह भी बीत गया एक दिन |

जग जिसे समझता अमर बेल
वह भी कट जाते है पलछिन ||

बैभव भी मिला यशगान हुआ
उसका भी कुछ अभिमान हुआ |

पर वह भी क्षंण एक मात्र रहा
जिजीविषा का आगमन हुआ ||

जब तक निश्चल है व्योम मही
तब तक तृष्णा रह जाएगी |

कर ले कोई त्याग तपश्या पर
जिजीविषा नही मिट पाएगी |!

मनोज उपाध्याय मतिहीन …🌺

Say something
No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  • 2
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    2
    Shares

About the Author:

मनोज उपाध्याय मतिहीन, अयोध्या नगर महासमुंद,छ.ग. पिन 493445

Leave A Comment

हिन्दी लेखक डॉट कॉम

सोशल मीडिया से जुड़ें ... 
close-link