अंतर का स्वयं मनन कर लो…

प्रलयंकारी वायु न जाने कितने घर उजाड़ दिया

किंतु प्राकृतिक तुला स्वयं मानव ने बिगाड़ लिया!

मै साश्चर्य सोचा करता हूँ धरती अब भी टिकी हुई

यद्यपि मानव ने हर हद से गिर कर अत्याचार किया  !!

स्वयं मनुज अपने कर से अपना मनुजत्व मिटा डाला

स्वार्थ वशीभूत मानव ने मानवता का संहार किया  !

सुधा बरसती थी अंबर से धरती हरी भरी रहती

पर लालच मे पड़ मानव अपना क्षय विस्तार किया!!

अब तो काटना पड़ेगा जो बोया है पेड बबूलों का

अब तो दण्ड परायण होना पड़ेगा उपजे शूलों का  !

अब तो गंध न मालूम होगा चंपक जैसे फूलों का

अब तो हमे चुकाना होगा ऋण अपनी ही भूलों का  !!

अब तो अपनी पहचानों का एक मात्र आधार मिला

संबंधो की अवधारणा पर  सब कुछ  निराधार मिला   !

अब तो हम अपने सुख से है सुखी नही जितना दुख है

हमको तो पीडा ये कि दिखता पर घर मे कैसे सुख है  !!

स्वयं विचारो कितने सत्य मिथ्याचारी कितने तुम हो

तुम्ही कहो कितने पुण्यात्मा व्यभिचारी कितने तुम हो !

तुम्हें कहां इतना कि तुम अपना अध्ययन कभी कर

लोकभीस्वयं स्वीकार करो अंतर का स्वयं मनन कर लो  !!

 

मनोज उपाध्याय मतिहीन…

अयोध्या नगर रायपुर महासमुंद

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मतिहीन

मनोज उपाध्याय मतिहीन, अयोध्या नगर महासमुंद,छ.ग. पिन 493445

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