जीवन सरल सरस निर्भय हो
सब अनुकुल अतुल सदय हो !

हम चाहे जैसे भी हो पर
कोई कही नही निर्दय हो !!

यह कामना है यही पीपासा
जैसे हो पूरी अभिलाषा !

चाहे शशि अम्बर तज भागे
चाहे भानु ना कभी उदय हो !!

रे मूरख मन कब जागेगा
इस जड़ता को कब त्यागेगा !

धरा फटे या व्योम गिर जाए
या वसुधा पर घोर प्रलय हो !!

हम चाहे तो वायु चले और
हम चाहे तो पल रुक जाए !

ऐसा हो सब चरण मे लोटे
मेरे आगे यम झुक जाए !!

मुट्ठी मे हो समय हमारे
यह चाहे नर विकल हृदय हो !

सकल विश्व हो दाश हमारा
लक्ष्य सकल हो पूर्ण विजय हो !!

-मनोज उपाध्याय मतिहीन

Say something
Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...