वृद्ध- आश्रम (पिता का उपहास)

वृद्ध- आश्रम (पिता का उपहास)

By |2018-07-12T20:44:37+00:00July 12th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

उन्हे बस गोद में तो बिठाया था,
झुका नही दुनिया के सामने पर
पर उन्होने घुटने टेक
घोडा बनवाया था,

रोज ले जाता साथ उन्हे बाजार
पैदल जो चलना सिखाया था,
हर जिद पुरी भी कर दी
जिस पर उसका मन आया था,

खुद चल दिया नंगे पैर पर
उनको कंधे पर बैठाया था,
जिगर के उन टुकडो को खुद से रख दुर
उनका भविष्य भी बनवाया था,

पर उनकी ये दुरी
मुझ पर भारी पड गयी,
उनकी करते खिदमत
मेरी उम्र निकल गयी,

बुढा हो गया मैं मुझको
अब कोई काम नही,
हाथ मे वो दम नही
पैरो मै वो जान नही,

अब लग रहा हु मै बोझ उनको
मेरा अब कोई छोर नहीं,
मेरे रहने के लिये
उनके पास कोई कमरा नही,

मंजिले तय करते करते उनकी
राह मेरी निकल गयी,
इसी उधेडबन मे देखो
मेरी जीवन संगिनी भी निकल गई,

अब रह गया हु अकेला,
कमजोर हो गया हु,
बुद्धि भी काम करती नही
वो कहते मैं सठिया गया हुं,

आँखो से मेरी देखो
अश्क सुख से गये,
दिखता नही इन आंखों से अब
दिन भी अंधेरे मे डुब गये,

एक दिन आये वो कहते मुझसे,
नई दुनिया तुम्हे दिखाते हे,
स्टेटस के लोगो से तुम्हे मिलाते हे
बडे प्यार से वो बोले
चलो पापा तुम्हे व्रद्ध-आश्रम छोड आते हे.
#Deepak_UD

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