प्रहरी

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प्रहरी

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* प्रहरी *

आँखों में तेरी सपनों के छौने
उछलते-मचलते मैं छोड़ आया था

गर्दन के नीचे चुनरी के पीछे
दिल को दिल से मैं जोड़ आया था

आशाओं की बगिया में बहता वो पानी
घर-आँगन से रिश्ता मैं जोड़ आया था

संभलना कि राहों में फिसलन बहुत है
रिमझिम फुहारें मैं छोड़ आया था

पिछवाड़े वो अपने जो उग रहे थे
काँटे वो इक-इक मैं तोड़ आया था

चढ़ते-उतरते हर मोड़ पर पुकारा करे थी
माँ प्यारी से मुख मैं मोड़ आया था

तेरे केशों की अनसुलझी मीठी पहेली
चेहरे पे इक लट मैं मोड़ आया था

यहाँ छेड़खानी करती है मौत ज्यों तेरी सहेली
वो जिसके इरादे मैं तोड़ आया था

सालों से चल रही थीं जो गर्म हवाएं
उनको मसलकर मैं निचोड़ आया था

आते-जाते लांघा करे थी मेरे घर की चौखट
विषैली वो आँखें मैं फोड़ आया था

हर जतन करेगी फिर से भरेगी
पाप की मटकी जो मैं फोड़ आया था

फिर जुड़ रही है म्लेच्छों-जयचंदों की टोली
जिसका लहू मैं निचोड़ आया था

हवाएं गुज़रती हैं मुझसे पूछकर के
जानती हैं मैं ज़िद्दी बड़ा हूँ

बापू से कहना अभी लाठी न थामें
आन-बान-शान पर मैं अड़ा हूँ

खेलो होली मनाओ दीवाली
जब तक सीमा पर मैं खड़ा हूँ
जब तक कि सीमा पर मैं खड़ा हूँ . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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