चलो कैसा लगता है…

चलो कैसा लगता है…

चलो कैसा लगता है

जब, सबके शिकवे भूलकर जीते है

सबसे घुल-मिलकर जीते है

अपने क्रोध को पीकर जीते है

चलो कैसा लगता है

 

चलो कैसा लगता है

जब, ग़म में भी हंसकर जीते है

हार से हम जीतकर जीते है

गिर के फिर उठकर जीते है

चलो कैसा लगता है

 

चलो कैसा लगता है

जब, अपना सबकुछ देकर जीते है

किसी का दर्द लेकर जीते है

दूसरों को खुश देखकर जीते है

चलो कैसा लगता है

 

चलो कैसा लगता है

जब, दुनिया को भूलकर जीते है

दुश्मन से मिलकर जीते है

यार कभी तो हम खुलकर जीते है

चलो ना कैसा लगता है

 

– जयप्रकाश अद्वितीय

 

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About the Author:

मै जयप्रकाश अद्वितीय, मेरे माता-पिता मीरामेश्वर (मीरा एवं रामेश्वर)। मुझे जीवन की परिस्थिति को समझना तथा उस पर लिखना मुझे बेहद पसंद है। और पढ़ने का प्यास है। मुझसे संपर्क मेरे E-mail jayprakashadvitiyajp@gmail.com पर कर सकते है। धन्यवाद

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