चलो कैसा लगता है

जब, सबके शिकवे भूलकर जीते है

सबसे घुल-मिलकर जीते है

अपने क्रोध को पीकर जीते है

चलो कैसा लगता है

 

चलो कैसा लगता है

जब, ग़म में भी हंसकर जीते है

हार से हम जीतकर जीते है

गिर के फिर उठकर जीते है

चलो कैसा लगता है

 

चलो कैसा लगता है

जब, अपना सबकुछ देकर जीते है

किसी का दर्द लेकर जीते है

दूसरों को खुश देखकर जीते है

चलो कैसा लगता है

 

चलो कैसा लगता है

जब, दुनिया को भूलकर जीते है

दुश्मन से मिलकर जीते है

यार कभी तो हम खुलकर जीते है

चलो ना कैसा लगता है

 

– जयप्रकाश अद्वितीय

 

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