बचपन के हाथ में है अब समय का चक्र .
अपने आने वाले कल की फिर क्यों हो फ़िक्र .
जिए जीवन गर हर इंसान यूँ ही बचपन सा ,
उतार कर बोझ अरमानो का ,रहे क्यों न बेफिक्र .
न कोई ख्वाईशे है मन में ,ना कोई आरजुएं ,
छोटी सी ज़रूरतें है , नन्ही सी बस चाहतें ,
बड़ी प्रसन्नता से उन्मुक्त भाव से ये भोला बचपन ,
चला रहा है स्वछन्द /स्वतंत्र रूप अपना जीवन-चक्र .

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