राजनीति का दाँव

राजनीति का दाँव

By |2018-07-15T21:08:47+00:00July 15th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

राजनीति का दाँव

गिरगिट बनता बात से,जिसमें रखके पाँव।

ऐसा धंधा एक है,राजनीति का दाँव।।

राजनीति का दाँव,सच की नहीं जी कीमत।

झूठा दो से चार,सच्चा लेता मुसीबत।

बने मदारी तेज़,नचाए जनता झटपट।

नेता ऊँचा आज,जो बनके रहे गिरगिट।

 

बिजली पानी ख़ूब दें,रोज़गार भी साथ।

नारा सत्तर साल से,नहीं आज़ भी हाथ।।

नहीं आज़ भी हाथ,देखिए खेल निराला।

जनता भूखी रोय,इनको हज़म घोटाला।

चाहे खाएँ देश, मिटती नहीं है खुजली।

जनता देखे बाट,गधा-सींग हुई बिजली।

 

आँसू आहें देखकर,रहता जो चुप यार।

मानव कैसा ख़ाक है,पाँव तले का ख़ार।।

पाँव तले का ख़ार,साथ छोड़ो तुम उसका।

ज़मीर गिरवी रोज,पड़ा रहे हार जिसका।

हिम्मत अपनी लाज,बनिएगा सदा धाँसू।

तभी रुकेगा देख,आँख से गिरता आँसू।

 

देना मत तुम सोचकर,लालच में ना हार।

वरना वो ही जीतकर,ख़ूब करेगा वार।।

ख़ूब करेगा वार,सहना और फिर रोना।

साल चलेगा पाँच,उसी का ज़ादू-टोना।

सुनो खोल तुम कान,धीरज से काम लेना।

जिसकी सच्ची सोच,बस मत उसी को देना।

 

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”

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राधेयश्याम प्रीतम पिता का नाम श्री रामकुमार, माता का नाम श्री मती किताबो देवी जन्म स्थान जमालपुर, ज़िला भिवानी(हरियाणा)

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