कविता
चलते जाना बाट बटोही 
थक कर ना रुक जाना रे |
जलते होंगे पाव के छाले
पर ना तनिक घबराना रे ||
यह जग एक तमाशे जैसा
तुम इस पर ना इतराना रे |
मनोनुकुल मंजिल ना मिली
तो किंचित ना पछताना रे ||
जला दीप यदि बुझ जाये
और हो जाये अँधियारा रे |
यह करतब है सृष्टि का प्यारे
तिमिर बाद उजियारा रे ||

मनोज उपाध्याय मतिहीन …
      
Say something
No votes yet.
Please wait...