फिर भी जगमगाता हूँ…

समेटता हूँ बिखरते ख्वाब को सजाता हूँ
रोज तकदीर को लिखता हूँ और मिटाता हूँ |

जो मद में चूर हो भूले है अपने ओहदे को
आईना देकर उन्हे उनकी जगह दिखाता हूँ ||

हवा हूँ मैं खुला ये आसमा वतन है मेरा
घरौदें फिर भी रोज रेत का बनाता हूँ |

मै आसमां का एक टूटा हुआ सितारा हूँ
वजूद कुछ भी नही है फिर भी जगमगाता हूँ ||

मनोज उपाध्याय मतिहीन

Say something
Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...