आईना मन का

आईना एक तन का ,एक मन का
जिसमे अपनी छवि निहारे तन का
जिसमे आत्मा की छवि निहारे मन का
छवि की रूप रेखा बदल खुद को निहार लो
अचित हो खुद को सवार लो
जो नहीं हो तुम
उसको ब्रहमित हो मान रहे
चेतना से दूर जा भ्रांतियों मे जान रहे
पर मन को अचित न करना
सचित मन ही सक्षम है बदलाव का
अंतरात्मा को नवीनता में जीने दो
कल्पना को छोड़ दो सिर्फ बाहरी दर्पण के लिए
अंतर्मंन को ना ईजाद कर
संजीदा रहने दो
संजीदा रहने दो
शालिनी जैन

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