मजदूर की व्यथा

मजदूर की व्यथा

By |2018-07-19T21:45:09+00:00July 19th, 2018|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

✍कविता
सुबह सवेरे काम को जाऊं,
रोटी चटनी जी भर पाऊं,
इतने ही में तृप्त हो जाऊं,
हां, फिर भी मजदूर कहाऊं।।
मेरे तो हैं, ठाट निराले,
मेहनत की रोटी सब्जी में,
खून पसीने का छौंक लगाऊं,
हां, फिर भी मजदूर कहाऊं।।
मुझसे ही तो कल कारखाने,
मुझसे ही तो खेत खलिहानें,
मैं ही तो असली मालिक हूं,
#हां, फिर भी #मजदूर कहाऊं।।
मेरे वजूद से कला की रंगत,
मैं ही कहानी का प्राण निरन्तर ,
जाने कितनों को पुरस्कार दिलवाऊं,
#हां, फिर भी #मजदूर कहाऊं।।

#सोचो,#सोचो…………………
#अगर कहीं मैं #गुम हो जाऊं तो,

कला चितेरे धरे रहेंगे,
कामकाज सब ठप रहेंगे,
सबको कैसे ये समझाऊं,
#हां, फिर भी #मजदूर कहाऊं।
मैं हूं अपने मन का राजा,
कौन है जो मुझ सा इठलाता,
हिंसा, चोरी, झूंठ से मैं घबराऊं,
#हां, फिर भी #मजदूर कहाऊं।।
#सीस पगा न #झगा तन पे,
नहीं किसी की दया मैं पाऊं,
कहीं किसी की चोरी ना कर लूं,
इस सोच (इमेज) से उबर न पाऊं,
हां, फिर भी #मजदूर कहाऊं।।
थक हार कर घर को आऊं,
व्यथा अपनी मैं किसे सुनाऊं,
परिवार संग बैठ इतराऊं,
हां,फिर भी #मजदूर कहाऊं।।

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