स्वप्न…

पौ फटी िकलकारियां पूरब दिशा से आ रही
मलयानील से महकती हवा मुझे जगा रही !

उठो मतिहीन समय व जमाना बदल गया
हर एक दिल में प्यार का दिपक सा जल गया !!

एक दुसरे से दूर थे जो एक हो गये
भटक गए थे लोग जो सब नेक हो गये !

आह! क्या स्वप्न था जो गत हुआ था पास दिख रहा
सतयुग की कहानियों सा संसार दिख रहा !!

काश! कि इस ख्वाब से बाहर न आता मैं !
और सच से परे दुनियां शायद भूल जाता मैं !!

मनोज उपाध्याय मतिहीन …

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