तुमने अभी कहां जाना है
मुझको कितना पहचाना है !

रो रो कर प्यास जगाता हूँ
हँस हँस कर दर्द भूलाता हूँ !!

तितिक्षा जीवन देती है
पीडा अंदर भर देती है !

उद्वेलित भवना कर देती
मै छलता इसे सुलाता हूँ !!

तुम मुझे ढूंढती कहां प्रिये
मै निर्जन कानन वासी हूँ !

तन जहां मेरा मै वहां नही
मै इस जग का उपहासी हूँ!!

मतिहीन मै मंथर गति चलता
मुझे रास न रंच भी चपलता !

मुझको अपना अपयश खलता
मै अहम नही दिखलता हूँ  !!

मै श्रेष्ठ बनूं कामना नही
अध्येष्ठ बनूं कामना नही !

मै तुम्हें प्रकाशित करने को
खुद को ही स्वयं जलाता हूँ !!

रो रो कर प्यास जगाता हूँ
हँस हँस कर दर्द भूलाता हूँ !!!

मनोज उपाध्याय मतिहीन

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