सदियाँ

सदियाँ

सदियों से तेरा छाया में रहे।
सदियों से तेरा गुण हम गाएं।
सदियों से तेरा छाया में शिक्षा लिए।
सदियों से तेरा छाया में गुरूमंत्र सीखें।

अब मेरा वक्त आया है तुझे बचाने की।
अब मेरा वक्त आया है तेरा हिफाज़त करें।
अब मेरा वक्त आया है तेरे वंशज को बचाएं।
अब मेरा वक्त आया है कि तेरा कल को बचाएं।

ये प्रकृति तुझे मैं भी शिकायत का मौका नाह ई दूँगा।
ये प्रकृति तुझे मैं भी दर्द का मौका नही दूँगा।
ये प्रकृति तुझे मैं भी कर्ज चुकाऊंगा।
ये प्रकृति तुझे मैं भी अपना धर्म समझ के निभाउंगा।

सदियों से तूने मेरा सहारा बना।
अब मैं तेरा सहारा बनूगा।
अब तेरा प्रजाति पर खतरा मंडरा रहा हैं।
कहें “प्रेम” कविराय अब तेरा अस्मिता को बचा लूँगा मैं।

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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