प्रकृति

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प्रकृति

ए पकृति हमें भी तुमसे प्यार है।
तेरे सारे शिकायत हमें स्वीकार है।।

ए प्रकृति तेरे हवावों हमें सुकून मिले।
तेरे बेरूखी ने हमनें सोने ना दिया।।

ए प्रकृति तू हमसे इतना नाराज़ क्यों है।
हमसे गलती हुई उसकी इतनी सज़ा मत दें।।

ए प्रकृति अब तू भी कितना कहर धाएँगा।
तुमसे ये सारा जग त्राहिमान हो गया ए प्रकृति।।

ए प्रकृति हम तेरे गुनाहगार है।
हमसब तेरे सितम से सहमें से है।।

ए प्रकृति अब हमपे तरस खा ज़रा।
हमलोग तेरी शरण मे आ गए, ए प्रकृति।।

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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