बरसात की ताज़ी झरोखें

दिल मे आग लगया कुछ इस तरह उसने।
बरसात के मौसम में हम जल के राख बन गए।।
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हम बैठें थे उनके इंतजार में।।
वो आयी और हाथ हिलाए।।
मुस्कुराई और चल दिए।।
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ए बारिस मुझे पता है।।
तेरे दिलवर से मिलने का समय आ गया है।।
इतना भी खुश ना हो जा ए बारिस।।
सब को अपनी खुशी में बहा ले जाओ।।
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उनका सितम भी इतना गहरा था।।
जितना समुद्र का पानी भी नही।।

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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