फाँसी पर झूल जाऊँ क्या…

भारत की गर्दन पर असि हो तो श्रृंगार सुनाऊँ क्या
लुटती लाज जहां हिन्दू की वहां भैरवी गाऊँ क्या !

नाक मे दम करता है कोई अपनी ताकत दिखलाता
मै शालीन सुसभ्य बने उसके आगे शरमाऊँ क्या!!

हिंसा ही जिसका मक़सद है काट न दूं क्यों सर उसका
वो है भेड़िए का वंशज मै बकरी बन मिमियाऊँ क्या!

टांग खींचते घर के भेदी छेद किए है थाली में
सबसे पहले इनकी ही मै पूंगी आज बजाऊँ क्या ! !

मैने दिया रहने को घर मेरे घर पर पत्थर फेका
इनको इनके असली घर का राह मै फिर दिखलाऊँ क्या!

गद्दारी का भोजन बिस्तर रोज लगाने वाले बोल
आज छीन थाली तेरी बिस्तर मे आग गाऊँ क्या!!

वह बोलने को आजाद जो जन गण पर आघात करे
मै जवाब देने से पहले उससे पूछ कर आऊँ क्या !

अपनी भीरुता पर पर्दा करने कुछ बहुत शरीफ भये
इनके जैसे ही मै भी माँ का सौदा कर आऊँ क्या!!

देश भक्त हूँ क्यों न देश विरोधी का अपमान करूं
अत्याचारी के आगे मै भी जा दूम हिलाऊँ क्या!

क्यो न भगत आजाद बनूं भारत पर बलि बलि जाऊँ
गद्दारों की आँख खोलने फांसी पर झूल जाऊँ क्या!!
मनोज उपाध्याय मतिहीन….

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