गायकी अब फन नहीं ,व्यापार बन गया ,

बस धन कमाने का बाज़ार  बन गया .

साज़ औ आवाज़  में न वोह सोज़ न कशिश ,

गला फाड़कर चिल्लाने वाला गायक बन गया .

भावों की गीली मिटटी में शबनम से तरन्नुम ,

कहाँ से लायें?,सारा जहाँ रेगिस्तान बन गया .

पश्चमीकरण हुआ जबसे फ़िल्मी संगीत का ,

भारतीयता उसमें रही कहाँ,बॉलीवुड बन गया .

ना उर्दू की तहजीब या हिंदी साहित्य के संस्कार ,

भारतीय गीत-संगीत का दामन मैला हो गया .

हमें नहीं भूलते हमारे महान रफ़ी ,मुकेश,किशोर ,

जिनकी महान गायकी से संगीत हो बन गया .

आज के दौर के फनकार बस जुगनू से चमकने वाले  ,

करले जितना भी जतन ,आफताब ना बन पाया.

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