बुझ गयी शमा परवानों को जलाते हुए ,

हाय ! यह कैसे दिन परवानों पर आये ?

जो मौत लिखी थी उनके हसीं हाथों से ,

लो ! अब बेमौत मरने के दिन आये .

सूनी कर गए वोह हमारी महफ़िल,

और हम अश्कों से नाता जोड़ आये .

क़ाबलियत के आईने में बिना मुंह देखे ,

यह नकली परवाने जाने कहाँ से आये ?

क्या करे उस महफ़िल का जिसमें तू नहीं,

यही सोचकर हम महफ़िल से उठ आये .

तुम्हारे बगैर क्या है हमारी जिंदगी ?

यह सवाल हमारे ज़ेहन में सौ दफा आये .

हम वोह नहीं जो जुगनुयों के पीछे दौड़े ,

दुनिया -ऐ महफ़िल छोड़ ,तेरे कूचे में चले आये .

 

 

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