वो सावन दिखे तो बताना!

वो सावन दिखे तो बताना!

सावन में नव विवाहित स्त्रियों की (मायके जाने की) प्रतीक्षा आजकल तो समाप्त ही हो गई है। ना तो पहले जैसे रिवाज रहे, और ना ही उन त्यौहारों को मनाने का समय। पेड़ों के झूले तो गायब ही हो गए हैं। नव विवाहित स्त्रियां सावन के महीने में मायके जाने का इंतजार करती थीं, कब भाई लेने आएगा। जिनके भाई नहीं भी होते थे, वो भी अपने रिश्तों के भाइयों से बेहद दिल से रिश्ता निभाती थीं। रोजाना मुंडेर पर कौवे को कांव कांव करते, मायके से किसी के आने का शगुन करना, आज भी याद है। ऐसा कहते हैं कि, प्रातः कौआ बोले और जिसका नाम लो, और कौआ उड़ जाए तो आपका उनसे मिलन शीघ्र ही होगा। लेकिन अब रिश्तों में मिठास कम होती जा रही है। अब भले ही पल पल की सारी सूचनाएं प्राप्त होती हैं, तो भी वो बात नहीं है।

सावन का महीना आते ही पहले विवाहिताओं के मधुर स्वर बारिश की रात्रि में या झूला झूलते हुए अक्सर सुनाई देते थे। जिनमें मायके में सखियों से मिलने का इंतजार हो या फिर घनघोर घटाओं को देख पिया के आने का इंतजार। सब कुछ बेहद खास हैं। ब्रज में महिलाओं द्वारा गाए जाने वाला एक खूबसूरत लोकगीत की पंक्ति याद आ रही है ___
झूला तो पड़ गए, अमुआ की डार पे जी….
ऐजी कोई हां हां, अजी हम्बे कोई हां हां ….
झूलाबे झूला कौन…
झूला तो पड़ गए, अमुवा की डार…

एक और गीत, जिसमें लोगों ने प्रकृति के साथ कितना सूक्ष्म, सटीक मानवीय सम्बन्ध स्थापित किया गया है। आज के समय में ना तो कोई नीम की निबौरी के पकने को जानता है, और ना ही कोई सावन के आगमन की, भावनात्मक जुड़ाव के साथ प्रतीक्षा ही करता है। धीरे धीरे हम लोग, पाश्चात्य संस्कृति को अंगीकार करते हुए, अपने लोकाचार, संस्कृति, प्रकृति, सबसे कट गए हैं। पता नहीं कौन सी सभ्यता का आवरण ओढ़, विकसित होने का दिखावा कर रहे हैं।
कच्ची नीम की निबौरी , सावन जल्दी अइयो रे,
सावन जल्दी आइयो रे, संग साजन को लईयो रे।

सावन माह के आगमन में देर है, क्यों कि नीम का फल ‘ निबौरी ‘ अभी तक कच्चा है। इस लिए सावन माह से शीघ्र आने का आग्रह किया जा रहा है। आज के बच्चे शायद इसे जानते, समझते भी नहीं होंगे।
कच्चे नीम की निम्बोरी चाचा जल्दी आइयो रे, चाची नहीं बुलाएगी।
मतलब नायिका परदेस गए चाचा को कह रही है तुम जल्दी लौट आना। नहीं तो चाची, मुझे सावन में नहीं बुलाएगी।
इसी तरह वह सब रिश्तों के पुरुषों को जल्दी लौटने को कहती है।इसको दूसरी तरह से भी गाते हैं
कच्चे नीम की निबोरी सावन जल्दी आईयो रे…
बाबा दूर मत दीजो, दादी नहीं बुलावेगी…
मतलब मेरी शादी पास ही में करना, दूर होने पर, सावन आने पर, बुलाने में घर की महिलाएं संकोच करेंगी।

सावन के महीने में जब कोई बहन, बेटी अपनी ससुराल से मायके में आती तो अपनी सहेलियों और बहिनों के साथ साथ झूलते हुए यह गीत गाती।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरसे
आँगन में है गई कीच री,
छोटी ननदी ने मेरो बटुआ चुरायो,
सैंडिल ले ले दे दे मेरौ बटुआ।
इस लोक गीत में बह लड़की अपनी ननदों के साथ हँसी मजाक चुहल करती हुई दीख रही है।

(हरियल हरियल अम्मा मेरी, है रही) इस गीत में देहाती मिट्टी की सौंधी महक है। यहां एक साथ वर्षा ऋतु की मुख्य पर्व हरियाली तीज तथा भाई दूज का उल्लेख है।
हरियल हरियल अम्मा मेरी है रही जी,
एजी कोई हां हां, हम्बे कोई हां हां
हरा ही है भैया को रुमाल।
मैं भी तो पहनूं हरियाल चूनरी जी,
कौन रंगावे अम्मा मोए चुनरी जी,
एजी कोई, हां हां, हम्बे कोई, हां हां…
कौन गढ़ावे गल हार,कौन मिलावे संग सहेलियां जी
मांय रंगावे बेटी तेरी चूनरी जी,
एजी कोई, हां हां, हम्बै कोई, हां हां,
बाबुल गढ़ावे गल हर…..
बिरन मिलावे संग की सहेलियां जी।
इसी तरह आगे कड़ियां बढ़ती जाती हैं, कि कब पहनूं ये चूनर और गल का हार। तो मां कहती है, कि तीजों पर तो चुनरी ओढ़ना,और भाई दूज पर गले का हार।और सावन में सभी सहेलियों से मिलना होगा।

एक और गीत जिसमें गरीब अपने मज़बूरी बता रहे हैं, कि पैसा नहीं है,कमाने वाला शहर गया है, छप्पर की मरम्मत, बेटियों के खर्चे साहूकार के कर्ज, इन सबसे चिंतित, महिलाएं सोचती हैं सावन देर से ही आए तो अच्छा।
कच्ची नीम की निंबौरी, सावन अभी न अइयो रे,
मेरा शहर गया होरी, सावन अभी न अइयो रे।
कर्ज़ा सेठ वसूलेगा, गाली घर आकर देगा,
कड़के बीजुरी निगोरी, सावन अभी न अइयो रे।
गब्बर लूट रहा बस्ती, ठाकुर मार रहा मस्ती,
है क्वाँरी छोटी छोरी, सावन अभी न अइयो रे।
चूल्हा बुझा पड़ा कब का, रोजा रोज़ाना सबका
फूटी काँच की कटोरी, सावन अभी न अइयो रे।
छप्पर नया बना लें हम, भर लें सभी दरारें हम,
मेघा करे न बरजोरी, सावन अभी न आइयो रे।

हमें आज भी याद है, आंगन में सभी अड़ोस- पड़ौस की महिलाओं का मधुर स्वर, तथा #नौहरे ( पुरुष बैठक, जहां पर काफी खुली जगह, पेड़, पशु भी बांधे जाते थे) पर पेड़ पर झूलते हुए हम बच्चे लोग भी गाते थे ये गीत।
नन्हीं नन्हीं बुंदियाँ रे ,सावन का मेरा झूलना ।
एक झूला झुला मैंने, अम्मा की गोद में,
हां अम्मा की गोद में, हाथ में गुड़िया रे,
सावन का मेरा झूलना…
बाबा की गोद में…

सावन में शिवजी को कैसे भूल सकते हैं, याद आया ये भजन__
शिव शंकर चले री कैलाश, बुंदिया पड़ने लगी,
कौन ने बोई हरी हरी मेंहदी, कौन ने बोय दई भांग,
बुंदियां गिरने लगी…

क्या आपको याद है????? झूले पर पींगे बढाना, झूले में रस्सी बांध कर झोटा ( ऊंचा व तेज झूला झूलने के लिए) देना, वो पुराना वाला ब्रज कहें या मायका (सावन में) विलुप्‍त सा हो गया है। अगर आपको कहीं दिखे तो बताना!!!!!!

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