मेरा अन्तर्द्वन्द …

“””””’ अंतर्द्वन्द “”””'””

बड़ा उद्विग्न होता हूँ बहुत बेचैन रहता हूँ
कतिपय कर्णहीनों को भला की बैन कहता हूँ !

मेरा संवादहीनों से न जाने क्यो नही बनती,
मगर चुप्पी को भी तो मै रहित संग्यान कहता हूँ !!

सत्य की खोज में मुझको सदा क्यों शुन्य मिलता है!
यहाँ तो झूठ-मिथ्या में कमल का फूल खिलता है |

मैने निज नाम को ही संज्ञा मतिहीन दे डाला,
मगर फिर क्यों मैं अंतर्द्वन्द का संधान करता हूँ !!

*मनोज उपाध्याय मतिहीन*

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मतिहीन

मनोज उपाध्याय मतिहीन, अयोध्या नगर महासमुंद,छ.ग. पिन 493445

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