आ अब लौट चलें

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* *आ अब लौट चलें* *

संगणक – सी दिन गिनती जाऊं
गिन – गिन लागे ढेर
स्मृति – पेटिका रिक्त है फिर भी
देखो तो इक बेर

बन अभियन्ता आन पधारो
दरीचे करते बैन
सुनो जी ए जी
मेरे दूखन लागे नैन . . . . . !

हाथ में मेरे यह चलभाषी
बूझत है दिन – रात
व्यस्त बतावे राह तुम्हारी
पापी करता घात

किस – किससे बतियाये रहे तुम
कौन तुम्हारा चबैन
सुनो जी ए जी
संपर्क – सूची सुधारो निकतैन . . . . . !

द्रुतचालिनी मेरी साथिन
जैसे तुम मेरे प्राण
चतुष्पथ आरक्षी खड़ा है
खोया मेरा शिरस्त्राण

प्रियतम मिलना कैसे होवे
कैसे सुखी हों नैन
सुनो जी ए जी
वीथि – वीथि जनरव बेचैन . . . . . !

नदी किनारे नासिका जलती
उपवन जले सरीर
विषैली पवन विकास की धाती
विषैला धरती नीर

अंधी दौड़ के अंधे राही
करतब अंधे – चुभीते हैन
सुनो जी ए जी
किस विधि लौेटे वो सुख – चैन . . . . . !

पाती लिखूं तो भेजूं कैसे
मृत भये डाक और तार
लकवाग्रस्त हुआ जग सारा
कपोत दिए सब मार

भीजन का सुख कुठार ने छीना
चलता दिन और रैन
सुनो जी ए जी
बरस रहे अब नैन . . . . . !

आगे गहरी खाई दीखे
पीछे कुआँ जलहीन
श्वेत – श्याम नयन सुहावे
बहकावे चित्रपट रंगीन

आ अब लौट चलें रे साथी
मितभाषी मिठबैन
सुनो जी ए जी
अंतरताने सुभग दरसैन. . . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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