मौसम का नज़ाकत

मौसम का नज़ाकत तो देखिए!
क़ातिलाना रूप धारण किये हैं!

सुबह से शाम हो गया बारिस!
ठहरेने का नाम नही ले रहा है!

ऐसा लग रहा है बारिस अपने!
जवां पर परवान चढ़ने वाला है!

बारिस के बूंदे अपने मिलने को!
आतुर हुआ है धरती से मानों!

धरती की प्यास बुझाने को!
व्याकुल दिखाई पड़ रहा है!

ऐसा प्रतीत होता है मानों!
कितना प्यार है धरती से!

सोंधी सी खुश्बू बिखरे धरती!
अपने अंग को भिगोने को आतुल!

नदी, नाले अपने उफ़ान में!
पुल को झकझोर देने को तैयार!

मौसम का नज़ाकत तो देखिए!
क़ातिलाना रूप धारण किये हैं!

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

Leave a Reply

Close Menu