बजरी बजरी

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बजरी बजरी

By |2018-08-03T23:08:16+00:00August 3rd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

मेरी मौलिक रचना ” बजरी ” अवश्य पढ़ें

(1) रचना – बजरी

इंसाँ के हाथों मारी गई
बड़े बड़े हाथोड़ो से कुचला गया ,
कभी राह में लात मारी तो
कभी गलियों में फेंका गया ,
बेबस और लाचार सी मैं
मिट्टी बनाकर दरिया में बहाया गया ।

एक रब का सहारा जो मिला
दरिया मे जीने का आशियाना मिला ,
तिनका तिनका जोड़ कर
धीरे धीरे दरिया से निकल रही थी ,
ये पानी मेरी माँ और दरिया
मेरे पिता जैसे हो गए
दुनिया मे मुझे फिर से जीवन मिला ।

पहाड़ो में पहाड़ी का नाम मिला
हरियाली ही हरियाली , बारिशों का पानी ,
मुस्कुराते हुए लोग लोग आते थे मेरे यहां
जाने कोनसे जालिम इंसाँ की नज़र लग गई ,
मुझको पहले टुकड़ो में बांटा गया
पहाड़ो संग मुझको भी काटा गया ।

टुकड़ो में सजाकर रखा किसी ने
कभी इस जगह कभी उस जगह
किसी को सजाकर बेची गयी ,
मेरे टुकड़ो से इंसाँ ने दौलत कमाई
और मुझको ही तरसाया गया ,
मेरे ही टुकड़ो को सरे-आम
“पहाड़ी” से “बजरी” बताया गया ।

हिम्मत और हौसले मौजूद थे
जो नाम मिले वो शौकीन थे ,
मुझको रेत , मिट्टी में मिलाया गया
दुर्मुट चलते रहे मुझ पर आह न सुने कोई ,
इंसाँ ने अपने आशियाने बना लिए
मुझको दर और दीवारों में दफनाया गया ।

कुछ घरों में बंद पड़ी हूँ
कहीं छतों पर बंधी पढ़ी हूँ ,
कहीं बच्चों के हाथों का खिलौना बनी
कहीं राहों में वाहनों से कुचल रही ।

मैं “बजरी” कमाल की
जी भी रही हूं तो मर-मर कर ,
मेरी जैसी कितनी मिट्टी हो गई ,
रब ने दिया जन्म ऐसा मुझे
मिट्टी से बनी फिर मिट्टी हो गई ,

– गुड्डू सिकंद्राबादी
Writed on : 30/07/2018

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