शहर में बेगाना

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शहर में बेगाना

By |2018-08-03T21:42:53+00:00August 3rd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

शहर में आ गया आपका
आज बेगाना लगता है
जिस गलियों से गुजरता हूँ
तुम्हारी याद सताती है
हर एक रास्ते पहचाने से भी इंकार कर रहे?
हर एक दुकान भी पहचान की तेरी याद दिलाती है
तेरे शहर की गलयों से आज
फिर से निकल के आया हूँ
तेरे साथ वो मंदिर में साथ
जानें का वक्त आज याद आ गया
आज से पहले ऑटो में
बैठने का तरीका अलग भी था
आज भी अजीब लगता है ऑटो में बैठा
आज कल बहुत ही बदल गयी है
ये दुनिया हो सकता है हम बदल गए हो
या तुम बदल गयी हो ये दौर की बात है
अब तो हम भी रूकष्ट करुगा इस जाहांन से
खो जाऊँगा एक दिन दुनियाँ के भीड़ में
आप की चेहरा मेरे से बदल जाएंगे
आपकी चाहते हमे अक्सर और
हमें आपको याद आता रहेगा

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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