इतना मजबूर

कोई इतना भी टूट सकता है
हमने सोचा भी ना था
इस क़दर कोई मजबूर होता है?
हमने तो गम से नाता जोड़ लिया
कोई इतना खिलाफ हो जाएगा?
नफरत या मोहब्बत ये तो जनता हूँ मैं
कोई इतना भी बिखरता है?
हमसे दूर कर आहे भरना
हमसे स्नेह भी रखना
मुझे इतलाह ना सही
हमसे दिल्लगी ही सही
आज भी मैं हूँ
उनके हर खामोशी
उनका हर एक अल्फ़ाज़ याद है
उनकी ये नादानी क्या समझे हम
इतने दूर हो के भी एक है
प्रेम ये भी कम है ?
हर एक अल्फ़ाज़ उन्हें याद है1
शब्दों का वो लिखावतें
हमरा सलीका
हम तौर तरीका
ये खूब है प्रेम
मोहब्बत आज भी उन्हें है
आज वें टूट कर चूर चूर हो गए है?
हम लाचार है या
वक्क्त ने हमलोग को लाचार बना दिया
कैसा ये कर्म है ईश्वर
हम हृदय मैं है जबान में नही?
बस दुआ है हम रहे ना रहे खुश रहो
टूट के भी टूट जाऊँगा आप सलामत रहे है

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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