कहत कबीर सुनो भाई साधों
रंक हुए कुबेर और खा गए सब धन!

रामराज्य के बात में खो गए
आडवाणी और अटल, मोदी!

कृषिप्रधान की बात ना पूछो
किसान हुए बेहाल और लाचार!

जियत मरत कौन पूछे भाई
सब रुपए के हुए संबंध भाई!

पाप पुण्य के चक्कर में
मन हुए बेहाल और बेवस!

धर्म और अधर्म नमे फस के
माध्यम वर्ग हुए धराशायी!

परोपकार और श्रद्धालुओं के चक्कर में
धर्म और ईश्वर के ठेकेदार हुए मालामाल!

कहत “प्रेम” कविराय इस जीवन
मोहमाया में फस के जीवन भुलाए!

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