प्रेमचंद ओ प्रेमचंद…

प्रेमचंद ओ प्रेमचंद ओ प्रेमचंद ओ प्रेमचंद…

प्रेम चंद सच सच बतलाना 3

दो भाई के बटवारे मे व्यथा द्वंद्व के अंधियारे मे

लाभ हानि की अग्नि मे जब सब आपस मे धधक रहे थे !

वो ज गए या तुम ही जले थे, वो जल गए या तुम ही जले थे !!

प्रेम चंद सच सच बतलाना… 3

संघर्षों की वेदी पर चढ नाव तुम्हारी तुम लाए थे.!
कैसे पार उतर पाए थे कैसे पार उतर पाए थे!!

जीवन पथ पर बहुत निराशा पग पग लगी घोर हताशा 2
द्वन्दों के घनघोर प्रलय से कैसे स्वयं निकल पाए थे !!

आने आने बडे सयाने पाए कुछ कुछ पड़े गवाने 2

जीवन क्या है आने जाने फिर उलझन क्या पछताने !

पर समाज के जन उपवन को तुमने ही तो महकाए थे

जग आया या तुम आए थे…. 3

प्रेम चंद सच सच बतलाना …

धनिया कोई या तुम रोक थे…

होरी चला सफर अंतिम अब वह देखो यम लेने आते
भगिनी बोली त्याग मोह अब दादा चले हो क्यो पछिताते!

सपन भगिनी की बातें मानो दिल मे तीर उतर आए थे
भरनी की उस काल गिरा पर धनिया रोई या तुम रोए थे !!

*मनोज उपाध्याय मतिहीन*

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मतिहीन

मनोज उपाध्याय मतिहीन, अयोध्या नगर महासमुंद,छ.ग. पिन 493445

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