मै प्रेम चंद के पन्नो से कुछ खास उठा कर लाया हूँ
मै गबन और गो दानों का इतिहास उठा कर लाया हूँ !

जो अब तक हुआ आगे ना हो इसका उत्तर मुश्किल होगा
जो कुछ साकार हुआ मुझसे वो आस उठा कर लाया हूँ !!

तुम चले नही दो चार कदम वरना हालात और होते
जो सर पर उठा सका अपने वो पास उठा कर लाया हूँ !

अब थाम लो अपने हाथों मे लगाम छूटने ना पाए
जो छोड़ चूके थे तुम शायद विश्वास उठा कर लाया हूँ !!

दम भर लो क्यों दम साध खडे क्यों घुटन भरे जीते हो तुम
इस कर्मभूमि कर्बला से मै कुछ श्वांस उठा कर लाया हूँ !!

जो है उपलब्ध वो सब तेरा मै तो मतिहीन जगत से हूँ
कुछ और नही अपने ख़ातिर उपहास उठा कर लाया हूँ !!

*मनोज उपाध्याय मतिहीन*

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