एक नई गजल :-

समन्दर के लबों पर तिष्नगी है।
मुझे इस बात की अफसुर्दगी है।।

वहाँ अपनी भलाई देख लेते।
जहाँ मौजूद तेरी बन्दगी है।।

चमक फीकी कभी होती नहीं है।
अगर जलवों में तेरी सादगी है।।

तेरी मंजिल तेरे कदमों में होगी।
अगर उसके लिए दीवानगी है।।

अलग – अलग दिखाई देती है।
हमारी आप की जो बानगी है।।

तमाम फूल जिसने तोड़ डाले।
उसके चेहरे पे कैसे ताजगी है।।
**जयराम राय **

Say something
Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...