चरण चूम कर दादा के,वह विजयी स्वर में बोला।
काँप उठी सागर की लहरें, सिंहों का गर्जन डोला।
चक्रव्यूह में रण करने की, अभिमन्यु ने ठानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
नहीं पता था अंतिम बाधा, कैसे तोड़ी जाएगी।
हार की प्रतिध्वनि विजयी ध्वनि में,कैसे मोड़ी जाएगी।
धर्मराज चिंतित थे, अभिमन्यु अभी बालक है।
बाल हाथ करता है, हठ वश भूला मानक है।
कैसे रण में भेजें, तुमको युद्ध भूमि का भान नहीं है।
युद्धों की सीमा मर्यादा का, जरा सा तुमको ज्ञान नहीं है।
रण भूमि की छल मर्यादा, उनकी जानी पहचानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी
ज्ञान चक्रव्यूह तोड़ने का, केवल अर्जुन को आता है।
बिन अर्जुन के रण में कोई, इसीलिए न जाता है।
नहीं गए यदि युद्गभूमि में, तो अपयश ही पाएंगे।
उस अपयश से तो हम, जीते जी मर जायेंगे।
धर्म रच्छा को युद्धभूमि में, यौद्धा लड़ने जाता है।
वीरगति पाकर वह वीर, स्वर्ग लोक को पाता है।
वीरगति पाकर रण में, होनी धन्य जवानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
अंतिम द्वार का चिंतन करके, उसका साहस डोला था।
उसको तो मैं गदा से तोड़ू, भीमसेन गरज कर बोला था।
गुरु द्रोण के चरणों में, उसने तीर चलाया था।
चरण वंदना करके उनकी, अपना शीश नवाया था।
वीर अभिमन्यु अर्जुन पुत्र , तब था उनको भान हुआ।
पाण्डु वंश के गुरु प्रेम पर, फिर था उन्हें अभिमान हुआ।
कुछ वर्षो का छोटा बालक, उसकी सूरत लगी सुहानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
प्रथम द्वार जयद्रथ खड़े थे, उनको था लाचार किया।
चंद पलों में अभिमन्यु ने ,पहले द्वार को पार किया।
प्रथम प्रवेश किया उसने, और नयन घुमाकर देखा था।
बाहर सभी पाण्डु वीरों को, जयद्रथ ने रोका था।
अब अभिमन्यु अकेला था, सामने शत्रु का मेला था।
प्राण हथेली पर ऱखकर, सिंहों से तब वह खेला था।
वह सिंह का छोटा शावक, सम्मुख सिंहों की मर्दानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
कैसे डर जाता सिंहों से, वह भी सिंह का शावक था।
सिंहों की भाँति गरजता था, शत्रु सेना को पीड़ादायक था।
अब उसने कौरव सेना का, खण्डन करना शुरू किया।
पाण्डु वंश की वीर कथा का, महिमा मंडन करना शुरू किया।
चाप चढ़ाकर धनुवा पर, रण की हुँकार लगाई थी।
शत्रु की कौरव सेना में, तब बाढ़ रक्त की आई थी।
रक्त की बहती गंगा में, शत्रु की नाव डुबानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
रक्त की नदिया बहती थी, सेना कट कट मरती थी।
उसके पौरुष के सम्मुख, किसी की कुछ न चलती थी।
युद्धभूमि में कँही किसी को, कुछ नही सुनाई पड़ता था।
त्राहि माम् का शोर मचा था, सवर्त्र अभिमन्यु दिखाई पड़ता था।
एक एक करके उसने, छह द्वार को तोड़ दिया।
हर द्वार पर उसने, एक महारथी को पीछे छोड़ दिया।
शत्रु को पीछे करने की, रण की रीति पुरानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
नाको चने चबवाकर सबको, सातवें द्वार पर जा पँहुचा।
अंतिम द्वार तोड़ने का वह , शुअवसर भी आ पहुंचा।
द्वार आख़िरी तोड़कर , विजयी पताका फहरा देता।
अभिमान तोड़कर कौरव सेना का, अपने सम्मुख शीश झुका देता।
कुछ छङ पश्चात तब ,पांडवो की होनी हार नही थी।
लेकिन स्वयं भगवान कृष्ण को, ये विजय स्वीकार नहीं थी।
चक्रव्यूह के काल चक्र में, होनी अभिमन्यु कुर्बानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
स्यवं रची थी उन्होंने होनी, खंडित युद्ध मर्यादा हो।
खंडित करने वाले यौद्धा भी, ज्यादा से ज्यादा हो।
युद्ध नियम खंडित हो, उसका भी कोई कारण था।
छल से नियमो के खंडन में, अभिमन्यु मरा अकारण था।
द्वार टूटता देखकर अंतिम, दुर्योधन का साहस डोला था।
एक साथ मारो बालक को, आदेश ध्वनि में बोला था।
किया अगर नियमों का पालन, तो होनी कठिन कहानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
तब महारथी सात, एक साथ ही टूटे थे।
एक छड विचलित नही हुआ, पसीने सभी के छुटे थे।
तब छल से सबने,अभिमन्यु सारथी मारा था।
निष्प्राण सारथी देखकर, हुआ व्याकुल बेचारा था।
उसके सब आयुधों को, महारथियों ने काटा था।
निसस्त्र हुआ वह अस्त्र शस्त्र से, फिर भी न झुकता माथा था।
ललाट पर कोई बल न था, भुरकुटि तब उसने तानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
अब अभिमन्यु उतरा रथ से, रथ का पहिया खींच लिया।
मुठ्ठियो बंध गयी क्रोध से, और दांतों को भींच लिया।
शत्रु सेना के सम्मुख, अब भी निश्चित खड़ा हुआ।
लिए हाथ मे काल चक्र, हिम् पर्वत सा अड़ा हुआ।
रूप भयंकर था प्रलयंकर, पहिये को ही हथियार किया।
उस अंतिम शस्त्र पर ,फिर सबने मिलकर वर किया।
कैसे बचता काल चक्र से, मृत्यू उसकी दीवानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
अब अभिमन्यु निहत्था था, सामने शत्रु का दस्ता था।
मृत्यु खड़ी थी सम्मुख उसके, फिर भी न आंहे भरता था।
गुरु द्रोण को देखकर सम्मुख, उसने उनको ललकारा था।
धर्मयुद्ध ये कैसा ये , शत्रु को भी धिक्कारा था।
लेकिन उसके प्रश्नों का, गुरू द्रोण ने उत्तर नही दिया।
नतमस्तक हुए अधर्म के आगे, आँखों को भी फेर लिया।
खारा जल था पलकों पर, बात अधर्म की मानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या, अब सोलह साल जवानी थी।
इतने में पुत्र दुःशासन ने , पीछे से था वार किया।
निष्प्राण हुआ एक गदे से, सिर पर था प्रहार किया।
माँ धरती की गोद में, वह आँख मूंदकर सो गया।
अम्बर का तेजस्वी तारा, धूमकेतु सा खो गया।
लेकिन कोई तारे का तेज, फीका नहीं कर सकता है।
वीरगति पाकर अमर हुआ हो, कभी नहीं मर सकता है।
पुत्र सुभद्रा कुरुक्षेत्र में, जिसकी अमर कहानी थी।
नौ माह में सीखी विद्या,तब सोलह साल जवानी थी।

कुमार आकाश”अर्जुन”

Say something
Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...