आखिर क्या है रिश्तों की डोर

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आखिर क्या है रिश्तों की डोर

By |2018-08-26T20:23:38+00:00August 26th, 2018|Categories: विचार|Tags: , , |0 Comments

परिवार का विस्तार (extension of family)…
केवल परिवार में जन्मे बच्चे ही परिवार नहीं हैं, सामाजिक रिश्ते भी उतने ही परिवार का हिस्सा हैं। कई बार लगता है, कितना अकेलापन है इस दुनिया में, काश!!!!!!!! कोई कोई ऐसा पुल हो जो जोड़ दे दिलों को, मिटा दे दूरियां। समाज को जोड़ने के लिए ऐसे पुलों की आवश्यकता है, और ये रिश्ते……. पुल का काम करते हैं। सामाजिक रिश्तों के कारण मनुष्य अपनी मर्यादाओं में रहने को बाध्य होता है। जो एक तरह से सही भी है,कई बार अगर अनावश्यक दखल हो तो उससे बचें। इन रिश्तों में सलाहकार, सुख दुख के साथी, अंतरंग मित्रता ही नहीं प्राकृतिक सौंदर्य के साथ रूहानी खुशबू घुली हुई है। इन अनगिनत रिश्तों की बातें भी हजार हैं। अनदेखे, अनजाने रिश्तों से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं हम, चाहकर भी अलग नहीं कर सकते। ये रिश्ते केवल रक्त, धर्म, परिवार से ही सम्बन्ध नहीं हैं, इनका विस्तार बहुत व्यापक है, हमारी सोच से भी आगे…. हवा, धरती, सूर्य, पानी, प्रकृति, प्रेम, सामाजिक दैनिक कार्य प्रणाली से जुड़े व्यक्ति, यहां तक कि जो हमारे जीवन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है, हम उसके भी सम्बन्धी हैं। अनजान शहर में जब कोई आपको जीने का सहारा देता है, बीमारी में सहायता करता है, तो ये सब क्या रिश्तों का विस्तार नहीं है ????? ये ही हमें वसुधैव कुटुंबकम् के जीवन सूत्र से परिचित कराते हैं।
शादी, ब्याह, रिश्तेदारियां क्या हैं ये सब?? मेरी नजर में तो ये परिवार का विस्तार ही हैं। इन में आने जाने से, दूर दूर तक के रिश्तों से पहचान हो जाती थी।आजकल रिश्तेदारियों में आना जाना बिल्कुल बंद ही हो गया है। बस केवल सीधे रिश्ते ही निभाए जाते हैं, या फिर अपनी पसंद के। जाना भी है तो, प्रथम तो पूछकर जाएं, फिर हो सके तो आप अपना रहने का इंतजाम स्वयं करके आए हों तो, बहुत ही अच्छा। अन्यथा, वो आपको अच्छा रिस्पॉन्स नहीं दे पाएंगे, उनकी भी मजबूरी है। समय और स्थान दोनों की कमी। ऐसे में एक पिक्चर याद आती है, अतिथि तुम कब जाओगे?????? इन खोखले रिश्तों में प्यार की मिठास, महसूस नहीं होती। इसीलिए कई बार आप उसी शहर, कॉलोनी, पड़ोस में रहते हुए भी अजनबी बन कर रहना पसंद करते हैं। कई बार आगंतुक इतने अधिकार पूर्ण हो जाते हैं, कि मेजबान का सारा रूटीन ही गड़बड़ा जाता है। अब वो पहले पहले जैसी बात नहीं है। जब रिश्तों में, मिलकर, जाकर तथा बुलाकर खुश भी होते थे, और अपेक्षाएं नहीं करते थे। अपने गांव, शहर के किसी को भी मिलकर एक अपनेपन का अहसास होता था, अब सब बदल रहा है। अगर आपका मतलब है तो आप बेझिझक (ही नहीं बेशर्मी की हद) होकर मिलेंगे, अन्यथा बेरुखी। वो रिश्ते, जहां सबसे मिलना जुलना, सुखदुख के साथी होते हैं, गायब होने के कगार पर हैं।अनगिनत रिश्तों की बातें हजार। अकेले व्यक्ति की कल्पना करना भी मुश्किल ही नहीं,अस्तित्व ही खतरे में लगता है।
इस एकाकीपन का क्या कोई इलाज है। इस अकेलेपन को तोड़ने के लिए ही रिश्तों के पुल चाहिएं। सुख दुख के लिए यह जरूरी भी है।आजकल सभी परिवारों में इगो, अहम, अधैर्य और अपनी स्वतंत्रता ने जड़ें जमा ली हैं। इसके चलते कई बार परिवारों में विघटन की स्थति तक पहुंच जाती है। मातापिता के झूठे दिखावे के चलते, बच्चों में अलगाव के हालात बन जाते हैं। जबकि कई बार बच्चे, निभाने की कोशिश करते हैं, तो कहीं पर मातापिता। मैं ही क्यों निभाऊं, वाली स्थति में रहते हैं सब। जब तक हम संबंधों की गर्माहट, सद्भावना को महसूस नहीं करेंगे तब तक एक बेहतर मनुष्य के रूप में अपनी पहचान भी नहीं बना सकेंगे। क्या अकेले व्यक्ति की कल्पना भी संभव है।

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