मेरी जंग

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मेरी जंग

By |2018-08-15T09:40:21+00:00August 15th, 2018|Categories: कविता|Tags: , |0 Comments

वर्दी नहीं  है मेरे पास पर जंग तो 

मैं भी लड़ती हूँ रोज़ 

सुबह सवेरे नींद से लड़ कर उठती हूँ

फिर तो जंग शुरू हो जाती है !

तलवार नहीं पर छुरी है मेरा हथियार

मैदान नहीं रसोई है मेरा रण ,

दौड़ दौड़ कर वक़्त पर करती हूँ वार

कभी वो कभी मैं जीत जाती हूँ !

तमग़ा या मेडल नहीं पर जीत मैं मुस्कान

और हार पर मायूसी मिलती है ,

दुश्मन मेरा वो फ़ालतू काम  है जो बिन पूछे

आ जाता है

सेना मेरी , मेरा हौसला है और सवारी

मेरे पैर बनते है !

कमज़ोर कर देता है , जब शरीर साथ नहीं देता

पर उससे भी लड़ती हूँ ..

ऐसा लगता है जैसे शहिद हो कर  ही मुक्ति मिलेगी,

वक़्त , भावनायें , उदासी , मायूसी सबसे रोज़ की जंग,

कभी तो समझोता हो सबके बीच,

कभी तो इस जंग मैं विराम लगे ,

कभी तो शांति छाए मेरे खेमे मे,

चलो इन्तज़ार करते है !

 

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