क्या अचरज है…

संघर्षों के उच्च शिखर पर
हवन बने तो क्या अचरज है !

जल जलकर प्रज्वलित अग्नि मे
जलन बने तो क्या अचरज है!!

सुमन सुसज्जित हूँ फिर भी
रज कण बन कर पददलित हुआ !

पदचापों के नीचे दब कर
कुचल गये तो क्या अचरज है !!

मनोज उपाध्याय मतिहीन

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मतिहीन

मनोज उपाध्याय मतिहीन, अयोध्या नगर महासमुंद,छ.ग. पिन 493445

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