सावन की तीजे
मनवा मोर भीजे है
बाबुल तोरा नेह
कैसे मै भूलूं
मेले मे जाना
पहनन को चूडियां
मन मोरा रीझे है
भोलीसी मन मर्जी
पांच रूप्पली खर्ची
वो पुडिया की पर्ची
मन मोरा खींचे है
मेंहदी की जिद्द
छपी हाथ पर चवन्नी-अठन्नी
रंगली वो मेंहदी
बाबुल तेरी पुच्ची
कैसे मैं भूलूंना है अब मेले
याद है हिंडोले(झूले)
बदरा जब बरसे
मनवा है तरसे
तब भीजे था तन
अब भीगे मन
सावन तो आवे हर साल
पर मै ना बढ पाई
खडी हूं अब भी वहां योगी
जहाँ नेह फूल बीजे

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