बरसात भाग-पहला

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बरसात भाग-पहला

By |2018-08-17T00:29:01+00:00August 17th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

.. बरसात भाग-पहला ..
बरसात हो रही हैं
तुम इतनी बेचैन क्यों हो रही हो
बार-बार तेरी निगाहें आसमान को निहार रही हों
आसमान में गड़गड़ाहट की शुरूआत हो गई है
तुम देखकर चिहुँक उठती हो बार-बार क्यों!

कितने उजले-काले भूरे-पीले बादल हैं
आसमान में समुंदर का खरा पानी पीकर
पृथ्वी के ऊपर छाने को बेताब है जैसे कि
हाथी की सूंड़ की तरह झुके हुए हो वैसे
खूब बरसात हो रही है प्रियतम
तुम्हें बरसात अच्छी लगती है न प्रियतम!

मैं जानता हूँ जब बरसात होती हैं
तो तुम्हरा दिन बहुत अच्छे होते हैं
न तुम्हें दफ़्तर जाने की फिक्र होती है
तुम अपने खाली पड़ी स्वपन को कढ़ती हो
सैकड़ों कल्पनाओं में खुद में खो जाती हो!

बहुत कठिन आसमान हैं
ऊपर तुम्हारे जगमगा रहे हैं तारें
तुम्हारे इतने लंबे हाथ नहीं
कि तोड़ सको उन तारों को

घनघोर उमड़ते हुए बादल
तुम्हरी आँखों में मैंने देखे हैं
शायद जिस दिन वें बरसेंगे
सारी क़ायनात भीग जाएगी!
प्रेम प्रकाश
13/08/2018

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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