बरसात भाग-तीसरा

बस दिले ख्वाइश हैं
तुम्हें बरसात के पानी में
भीगते हुए देखने की तमन्नाएं हैं प्रियतम!

बरसात हो ऊपर से तेज हवाएं हो
झकझोर देने वाली आँधी हो और
खो जाओं तुम इन तूफ़ानी बरसात में
तुम घनघोर जंगल में तुम्हें आँधी उड़ा ले जाएं
बरसात में अकेली भीगती रहो तुम प्रियतम!

वृक्ष जिस प्रकार भीगते है अकेले
उसी तरह तुम भी अकेले भीगो
भूल-कर गलती से मैं उधर
बादल की तरह मैं तुम्हें निहारता रहूँ
और तुम्हें इल्म भी ना हो मैं तुम्हें देख रहा हूँ

गुलाब की पंखुड़ियों की तरह खिले हुए
मैं तुम्हारे हर एक-एक अंग को निहारूँ
फिर मुझे धरती के बारे में सोचूँ!
प्रेम प्रकाश
16/08/2018

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