#गीत#
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नवोदय उदय ये नव है हमारा।
दिखाया इसी ने मंज़िल-किनारा।।

माला-मनकों से रहते थे सारे।
भेदों को तोड़े चाहत के मारे।
कि यादों बसा है हरपल गुज़ारा।
दिखाया इसी ने मंज़िल-किनारा।।

गुड़ जैसे दिन थे चीनी-सी रातें।
नियमों-सजती संस्कारों की बातें।
बड़ी थी ये क़िस्मत पाया सहारा।
दिखाया इसी ने मंज़िल-किनारा।।

सारा भारत हो इसके ही जैसा।
हे रब करदे तू ज़ादू ही ऐसा।
मिलेगा यहाँ फिर स्वर्ग का नज़ारा।
दिखाया इसी ने मंज़िल-किनारा।।

नवोदय उदय ये नव है हमारा।
दिखाया इसी ने मंज़िल-किनारा।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
तर्ज़-बहुत प्यार करते हैं सनम।

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