मुझसे कुछ रंज हो गया शायद…

गजल…

212, 112, 112 ,212
122, 112,112,212
बहर… मदीद. फाइलातुन, फाइलुन
काफिया… हो गया
रदीफ… शायद.

वो रज़ामंद हो गया शायद
वक्ते पाबंद हो गया शायद !

उरूजे तख्त पर कल थी हस्ती
आज मुह बंद हो गया शायद !!

कल जमी पर न पैर थे उसके
पांव कुछ मंद हो गया शायद !

कलाम से मेरी अदावत कर
वो फिक्रमंद हो गया शायद !!

मुगालते उसकी सुर्खियों मे थी
हिकमत ए चंद हो गया शायद !

असलियत रूबरू आ जाने पर
मुझसे कुछ रंज हो गया शायद !!

मनोज उपाध्याय मतिहीन

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मतिहीन

मनोज उपाध्याय मतिहीन, अयोध्या नगर महासमुंद,छ.ग. पिन 493445

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