हे वीर भोग्या वसुंधरे!

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हे वीर भोग्या वसुंधरे!

हे वीर भोग्या वसुंधरे !
चरणों में शीश झुकाते हैं ।

कतरा-कतरा फिर लहू गिरे
अंग-भंग हो यां शीश कटे
ये कदम कभी नहीं थम पाए।
ये शौर्य कभी नहीं झुक पाए।
न झुकने देंगे तेरे सिर को
कसम हम मिल के खाते हैं ।
हे वीर भोग्या वसुंधरे!
चरणों में शीश झुकाते हैं।

ना कंठ में चाहे श्वास रहे।
यां नील नदी में रक्त बहे।
ये निडर-जिगर नहीं डर पाए।
ये तूफां फिर ना रुक पाए।
न छुपने देंगे सूर्य तेरा ।
कसम हम मिल के खाते हैं ।
हे वीर भोग्या वसुंधरे!
चरणों में शीश झुकाते हैं ।

मुक्ता शर्मा

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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