तिरंगे की पुकार

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तिरंगे की पुकार

झुकी नजर से रहा निहार।
रो रहा तिरंगा ज़ार-ज़ार।
अब दो बदल रंगों के अर्थ-
पुराने अर्थ लगें बेकार।

औरतों की सुन चीख-पुकार।
केसरी रंग करता गुहार।
प्यार अगर है मुझमें तुम्हें-
आंचल अब न जाए दुत्कार।

बुजुर्गों से खाते हो ख़ार।
घर-जिगर पर लगते हैं भार।
सफेद भरो तुम मुझमें तभी-
माँ-बाप से हो निश्चल प्यार ।

हरा तो है जीवन का सार।
पेड़ और बच्चे ही बहार ।
अपने भविष्य की करो रक्षा-
वातावरण की सहे न मार।

नील चक्र भी करता पुकार।
तिरंगे से करते हो प्यार ।
वैमनस्य बंधन तोड़ो तुम-
समस्त समृद्ध बारंबार ।
।।मुक्ता शर्मा ।।

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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