तिनके पर वजूद है

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तिनके पर वजूद है

By |2018-08-26T20:11:53+00:00August 26th, 2018|Categories: कविता|0 Comments

तिनका पर वजूद है
कभी इस डाल से कभी उस डाल से तोड़ के बिखरा देता है मुझे मेरा क्या औक़ात है कि मैं किसी का बिगाड़ सकू पर जब मैं अपनी पर
आ जाऊ तो मनुष्यों को रूला दें!

प्यार और जंग में सब जायज है
पर आज की मोहब्ब्त और जंग
अपर्यतम और असंतोष प्रिय है
जहाँ जंग की बात कहें तो ज़हीरा
पदार्थ की तरह तरल पदार्थ हो

बतकही की बात कहें तो
यथार्थ की बात क्या कहें
कड़वा की सच है कि अपने ही अपने के लिए ईष्या करते है लोग यहां पर एक दुशरे के विपरीत होते नज़र आते है लोग यहां!

आज तिनके का सहारा है
मेरे जन्मदाता ही है जो
भाग्य बनातें है बाकी सब
कहने के लिए अपने बहुत है
आज तिनका के सहारे ही
सही पर वजूद अपना बनाऊंगा!
प्रेम प्रकाश
22/08/2018

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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