गजल…

ढल गई रात गम की एक सूरज उगा दे
सो रहा मुल्क मेरा मेरे मौला जगा दे !

उम्र गूजरी हमारी तेरे सजदे मे मालिक
मुरादें पूरी कर दे अब न हमको दगा दे!!

मेरा वही पुराना वतन मुझको अदा कर
तमन्ना बस यही है मेरा गुलशन खिला दे!!

बहारें फिर से आएं मुहब्बत गुनगुनाएं
ये मेरी आरजू है नफरत को कजा दे !!

होश शायद नही है खयाल कुछ नही है
तू सबका रहनुमा है राह तू ही बता दे!

नजर कुछ भी न आए ये क्या तूफां उठा है
कोई साथी नही है मुझको तू ही सदा दे!!

मनोज उपाध्याय मतिहीन…

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