मुक्तक माला-01

*मुक्तक माला…*

01 .
बेसहारों का सहारा बन के दिखलाओ
हम अकेले है हमारा बन के दिखलाओ |
मैने देखा है तूफां ही जिन्दगी में हर कदम
अब भंवर में तुम किनारा बन के दिखलाओ ||
02.
निर्दोषों की गर्दन काटे करे कामना खुशिहाली की
स्वयं लगा कर आग बाग मे करे याचना हरियाली की !
भारत के दक्षिण नरेशों के भी दान यश हमने देखे
पाप फलित होने आया तो रोना रोते बदहाली की !!
03.
विदीर्ण उर अति तीक्ष्ण शर सहसा उतर आया कहां से
चित्त व्याकुल विप्लवी संदेश क्या लाया कहां से !
अश्रु की अविरल प्रवाहों की पराकाष्ठा निहारों
सिंधु दृग के जल प्रलय मे किसने डुबोया कहां से. !!
04.
*हमे भी है ये गम कि हम तुमसे जुदा है*
*महज हम आदमी है और तू खुदा है !*
05.
शिकायत भी करो मुझसे हिदायत भी करो मुझसे
नजाकत भी करो मुझसे बगावत भी करो मुझसे !!
करो कुछ भी गंवारा है मगर इतना अता करना
अदावत भी करो लेकिन मुहब्बत भी करो मुझसे !!
06.
यही तो रूह है मेरी यही तो जान है मेरा
जिसे तुम देश कहते हो यही तो आन है मेरा |
माँ भारती के नाम से वाकिफ है ये दुनियां
हमारे खून में शामिल ये हिन्दुस्तान है मेरा ||
07.
जब उम्रे-दराज बचपने की बात करता है
ओछी हिमाकत अनुभवी बदजात करता है |
उम्र बढने से कुछ नही ये कहावत भी सही है
जो उसकी नश्ल है पैदा वही हालात करता है ||
07.
प्रतिभाओं की घोटते गला यहां पर लोग
अपने हित संजो रहे सपने कर उतजोग !
चाँद सूरज की यदि कही दिखा इन्हें प्रतिबिंब
उसको कैद मे डालते चला कोई अभियोग !!

08.
यदि मुखर आया कोई करने सिद्ध सुजान
मिलकर कुंठा ग्रस्त सभी करते है अपमान !
जब तक होता प्रलय नही जब तक न जाए जान
तब तक अँधी आँख है तब तक बहरे कान !!
09.
ग्यान बांटते फिर रहे पर उपदेशी लोग
इन्हें परख देखे कभी मिलते करते भोग !
स्वयं श्रेष्ठ कहलाने मे खुशामदी मे चूर
सत्य नही स्वीकारते पाले मिथ्या रोग !!
10.
फिरे तो सरफिरे है आग ही लगा देंगे
पाक नापाक का नामो निशां मिटा देंगे |
हमें ना खौफ कोई तोप या संगीनों का
लडे तो ईंट से फिर ईंट ही बजा देंगे ||
11.
तिरंगे ने बडे मायूस होकर हमसे ये पूछा
हमे फहराते हो दो दिन कफन हम रोज क्यों बनते
कि जिसने मेरी अस्मत के लिए दे दी बली अपनी
मगर फिर भी उन्ही पर देश के गद्दार क्यों तनते !!
12.
शेष अशेष कहां जग में एक रंगमंच यह जीवन है
माली है एक सदा ईश्वर हम सब उसके उपवन है |
बस भूल यही समझा मानव कृतकर्म किये स्वयं उसने
भेद सदा यह भेद रहा यह भेद ही अंतिम बंधन है ||
13.
चमन खिला नही सकते तो जलाते क्यों हो
साथ चलना नही तो अपना बनाते क्यों हो!
प्यार करते नही दिल से तो बताते क्यों नही
दिल में रखते नही तो प्यार जताते क्यों हो !!
14.
किसी को देख अरमानो को झिंझोडा नही करते
कुछ ऐसे फूल होते है जिन्हें तोड़ा नही करते!
अगर मिल जाए कोई खूबसूरत हमसफर तुमको
तो राहे छोड़ दो उसको मगर छोड़ा नही करते!!
15.
बहुत मुश्किल है कि बनिया कोई तुमको मिले सच्चा
किसी की बात पर इतना यकीं करना नही अच्छा !
जरा चलना संभल के लोग दुनियां है बहुत शातिर
भले इंसान से फिर भी है मुकरना नही अच्छा!!
16.
आना और जाना कब ना तू जाने ना हम जाने
बने कैसा बहाना कब ना तू जाने ना हम जाने !
बनाया है हमे जिसने उसे है सब पता लेकिन
बना ये ताना बाना कब ना तू जाने ना हम जाने !!
17.अगर गैरों की हो बातें सयाना खूब लगता है
उन्हें औरों को छलने में निशाना खूब लगता है !
मगर जब बात हो अपनी तीरंदाज़ी है खो जाती
उन्हें औरों पे बस फितरे बनाना खूब लगता है !!
18.
मैने भी अपना नाम न युं ही रख डाला मतिहीन
हां, मैने स्वयं स्वीकार किया है तू राजा मै दीन !
फिरभी हंसता है तो हंसले जो चाहे आवजे कसले
पर सच है तू पागुर मलता हमी बजाते बीन !!
19.
खुद ही गुम कर बैठा है खुद को ही कही
और अपना ही पता पूछने आया मुझसे !
मैने भी कह दिया मत हो तू दर बदर ऐसे
तुझमे ही बिखरा पड़ा है तेरा वजूद कही!!
20.
आसमान मे सुराग करने चले
अपने मुह पर गिरा लिया पत्थर !
एक जहनसीब ने कांटे के लिए
जिस्म मे अपने चुभा लिया नश्तर !!
21.
दूर तक दूर तक देखने की आदत थी
अक्स अब अपना भी नही दिखता !
ख़्वाहिशों मे तमाम उम्र गवाई फिर भी
हाथ खाली ही रुख़सत हुआ जहां से मै!!
22.
मुझे क्यों चैन नही सुन के क्यो दिल मे उतर गया
हर एक ख्वाब संजोया मेरा यूं ही बिखर गया !ट
क्या जाने कितने चढते पत्थरो पर चढावे
और कल एक बच्चा भूख के मारे ही मर गया! !
23.
कभी कसौटी पर कसकर कुछ बातों पर बल दिया करो
कभी श्रेष्ठता कर्म की होती कभी श्रेष्ठता आशन की !
देश काल अवसर देख कर बोला कर तू ऐ मतिहीन
कभी महत्ता चुप रहने की कभी महत्ता भाषन की !!
24.
किसी ने क्या कहा कैसी रवायत हो रही है
मेहरबां हो गए मुझ पर इनायत हो रही है !
गलतफहमी मे जली आग मे जल जाए ना हम
कही ऐसा तो नही कि अदावत हो रही है !!
25.
आशातीत यादों की गलियारों के अंधेरों में
तुम स्वप्न बने आये और आ कर चले गये |
युग युग से मिलन की तृष्णा उर मे बनी रही
हम पुन: तुम्हारे मोह – जाल से छले गये ||
26.
फटी रह गई आँख क्या जाने कैसा मंजर देख लिया
दोस्ती के आस्तीन मे शायद उसने खंजर देख लिया !
बाहर से खुशनुमा दिखा वह दृश्य बडा मनभावन था
ऊपर ऊपर राम था लेकिन अंदर अंदर रावन था !!
28 .
हाथों में हाथ थाम कर चलते थे कभी
अब तो बमुश्किल ही बात होती है |
एक पल भी न गुजरा कभी जिनके बिन
उनसे अरसे कभी मुलाकात होती है ||
29.
जमाना मुझको कहता है उनकी सब नही सुनता
मगर कोई न जाने मै किसी की कब नही सुनता !
वैसे मुझको जमाना सुनता है मै उसको सुनाता हूँ
मै उनको सूनता हूँ जिनका कोई रब नही सुनता !!
30.
मुझे मालूम है तनहाई पल पल मे सताएगी
घड़ी भर को तेरा चेहरा न आँखें भूल पाएगी !
मगर दस्तूर दुनिया का है मिलना और जुदा होना
मुकद्दर मे रहा मिलना तोफिर किस्मत मिलाएगी!!
31.
जिन्दगी रास्ता घर का जरा बता देना
जो हकीकत है उस का जरा पता देना !
खाक डालेंगे मुह पे जो है चाहने वाले
तू भी अपनी नही एक रोज ये जता देना !!
32.
बे हिचक अक्सर गुनाह करता रहा
और वो मुझको तबाह करता रहा!
छोड़ कर जाऊंगा उसे अगले बरस
सोच कर यूं निबाह करता रहा !!
33.
हया की बात छोड़ो हया सब छोड़ डाले
समझदारों ने खुद ही घरो को तोड़ डाले !
बड़ों को देखते ही कभी सर थे झूकाते
अदब के बंधनो को मगर अब तोड़ डाले !!
34.
मुख के प्रतिबिंबो को देखा वेदना असीम गरजती है
नयनो के मौन कोलाहल मे जिजीविषा अनेक उभरती है !
है सृष्टि सृजन करता नारी फिर भी कैसी अभिशापित है
सब हंसते हंसते सहती है ना जीती है ना मरती है !!
35.
आज आओ चलो चले के खता कर लिया जाए
थोड़ा जी लिया जाए थोड़ा मर लिया जाए !
हमे मुहब्बत है ये जताना है जमाने को आज ही
कही खुले मे चलकर मुंह काला कर लिया जाए !!
36.
बदगूमानीयत में लोग बहके जा रहे है
किसी को इल्म तक नही कहाँ जा रहे है !
फना मतिहीन है अब गैरतों की तकरीरें
हमाम में सभी नंगे तो अब नहा रहे है !!
37.
ऐसे ही अपने हुस्न को जाया न करो तुम
कान्हा से मिलने यमुना आया न करो तुम !
तुम्हारे एक इशारे पर वो आ जाएंगे दौडे
राधा यूं सबके सामने बुलाया न करो तुम !!
38.
प्रसव मे है मजा कितना या उसमे दर्द कैसा है
चला मखमल पे जो वो क्या बताए दर्द कैसा है !
जिन्हें सोने की थाली मे दिए पकवान जाते है
उन्हें क्या है खबर कि पेट भी बेदर्द कैसा है !!
39.
मुझे उनसे कभी शुकून हो ये हो नही सकता
सदा ही एक सा जुनून हो ये हो नही सकता !
मै उस पर जाँ लुटा दूँगा यकीं उसको नही शायद
कभी वो भी मेरे मुमकून हो ये हो नही सकता !
40.
इस तरह से भी होली मनाया न करो तुम
सबको ही अपने घर में बुलाया न करो तुम !
तुम्हें रंग खेलना है तो हमसे ही खेलना
किसी और को यूं रंग लगाया ना करो तुम !!
41.
हम खून बहाते जाते है तुम पानी इसे समझते हो
हम दर्द बयां करते है तुम कहानी इसे समझते हो |
अपराध को देते संरक्षण माँ का आँचल मैला करते
हम जब जब राह दिखाते है नादानी इसे समझते हो ||
42.
नजर में कत्ल का मंजर उतारा जा नही सकता
लगी हो जान की बाजी तो हारा जा नही सकता !
कोई कितना बडा भी हो सपेरा पर यही सच है
छुपे आस्तीन के सापों को मारा जा नही सकता !!
43.
लंबी दौड के घोड़ों को जिसने बांध रखा है
वही गदहों को आरक्षण दिया आबाद रखा है !
मगर भूले नही वो लोग जिसने मुफ्त मे पाई
इन्ही लोगों मिलकर देश कर बरबाद रखा है !!
44.
कवि कुल के कुछ दीप बुझे है
रुदन मचा अवनि अंबर !
मलयानिल स्तब्ध ठिठक कर
देख रहा यह दृश्य मगर !!
45.
धरा विदीर्ण वक्षस्थल पर
रख निष्प्राण देह विलाप करे !
टूटने को आतुर है व्योम
मन कौन करे गढ कर प्रस्तर !!
46.
सिर से ऊपर निकले छंद
समझे कौन मती से मंद !
मिथ्याचार से समय नही
किसको क्या है मत्त गयंद!!
47.
प्रस्तर पर कर शर प्रहार
रहा सदा निश्चल निर्द्वंद !
किंकर्तव्यविमूढ बना है
देख द्रवित उर का आनंद!!
48.
अधरों से गंगा बहती मै जनम जनम की प्यास लिये
तुम चलती धैर्य धाराओं सी मै थका हुआ हताश प्रिये !
एक बूंद भी मिल जाए पावन उर दावानल की आग बुझे
मै सुखी हुई मरुभूमि प्रिये सदियों सदियों का त्रास लिए !!
49.
बस्तर की छाती को छलनी कर बार बार वो देते है
हम हाथ पे हाथ धरे बैठे कुछ सहानुभूति दे देते है !

जिन माओं की गोदी सूनी जिस मांग का है सिंदूर छिना
उनसे तो कभी पूछो जाकर किस तरह वो फिर जी लेतेहैं !!
50.
तुम सियासत जानते हो हम मुहब्बत जानते है
तुम पराया कर दिए हम तुमको अपना मानते है !

तुम बिखेरो लाख कांटे हम बिखेरे खुशबू ए गुल
आप शायद फूल की फ़ितरत नही पहचानते है !!
51.
धूप बख्शा आपने कोई गिला हमको नही
आपकी रंगत रहे हम शामियाना तानते है !

लाख कमियां आपने मेरी बताई है मगर
आपकी अच्छाइयों को हम सदा बखानते है !!
52.
दहशतों का सिलसिला जारी है बदस्तूर
हो गए हैं लोग सच्चाई से कोसो दूर !

अपने जद मे आग न लग जाए सबको है फिकर
है बदल कर रूप जीने को सभी मजबूर !!
53.
क्यू हुए अपनी डगर से फिर रहा अंजान है
हिन्द की धरती यहां हर व्याध का निदान है !

क्या हुआ जो शक्ति लगने से हुए मूर्छित लखन
बन रहो निर्भय कि रक्षक राम दूत हनुमान है !!
54.
कहा जाए जो समझाने को वो संबोध होते है
मगर दुहराए जो गलती वही निर्बोध होते है !

करो कुछ भी मगर जो बात ना माने किसी हद पर
पकड़ कर ठोक दो उसको वो आदरकोद होते है !!
55.
बड़े जो लोग है उनमें बड़ी दूरी भी रहती है
उन्हें खुद को अलग रखने की मजबूरी भी रहती है !

समाजों के रिवाजों से उन्हें मतलब नही कोई
भरी उनके दिमागों मे ये मगरूरी भी रहती है !!
56.
खुद से खुद का बोध हुआ
सार्थक यह अनुरोध हुआ !

जीवन मे जीवन पाया
गुढ रहस्य का शोध हुआ !!
57.
मुझसे बेहतर मुझे कोई भी जान लेता है
खुद मुकरता और मुझसे जुबान लेता है !

मुझे फुरसत ही नही अपने रंजो गम से कभी
फिर भी हर बात पर वो आँख तान लेता है !!
58.
हमारे देश की मिट्टी मे कुछ तो बात ऐसी है
यहां रहते हैं योगी भी यहां रहता ओवैसी है !

कोई देशभक्त अपनी देशभक्ति का दीवाना है
कोई है देश का दुश्मन मिली फ़ितरत ही ऐसी है !!
59.
कोई साबूत मांगे और कोई शहीद होता है
किए जाते करम जिसको मिली सौगात जैसी है !

जिसने सोहरते पाई विरासत मे वो क्या जाने
चढेंगे चोटियां जिसको मिली औकात जैसी है !!
60.
जीवन मे जीवन का मूल नही समझा तू अगर
समझो जीवन संपूर्ण अकारथ बीत गया !

हस्त पुष्प पराग परमार्थ योग सिद्धियां मगर
समझ सका ना मूरख मन कर रीता था कर रीत गया !!
61.
जबां पर लग गया ताला चलो अब हम न बोलेंगे
परेशां हो अगर कह दो न कोई राज खोलेंगे !

सियासत ने हमे हर बात पर हर दम सताया है
हमे आदत है रोने की चलो आगे भी रो लेंगे !!
62.
मिशालें दी जहां जाती नसीहत की जहां जाती
वहां धोते रहे है दाग हम आगे भी धो लेंगे !

दमन करना तेरी फ़ितरत करा ले सर कलम मेरा
बहुत ढोए है पापों को इसे आगे भी ढो लेंगे !!
63.
अगर महफिल मे हम नही तो कहते है नवाजिश है
मगर मौजूद होते है तो कहते है कि साजिश है !

अगर जीते नही तो कहते है जीता नही है क्यो
अगर मरते है तो कहते मेरे मरने मे साजिश है !!
64.
वो मुझसे बोलते है बोलने मे क्या है बोलना
जिन्होंने बोलने से पहले सीखा है न तोलना !

हमे सिखलाते पैतरे जो उनकी अपनी फ़ितरत है
मगर फिर बाद मे कहते न कोई राज खोलना !!
65.
जब तक तीखे शब्द सुने ना तब तक कान बने बहरे
जब तक बात न लगे हृदय मे आँखें तब तक अँधी है !

सच बोलो और गला गंवाओ कोई सुनता नही यहाँ
न्याय मूर्ति भी कैसे देखे आँखों पर पट्टी बंधी है !!
66.
अगर सुनाना है लोगों को सूई चूभोनी पड़ती है
जब तक खुद को दर्द न हो वेदना कहां उमडती है !

कह दो अपनी बात जिधर सबकी भौ उधर अकड़ती है
सबका अपना स्वार्थ है खींचे इसी पे दुनियां लड़ती है !!
67.
शर्तों पे मुहब्बत थी शर्तों पे अदावत थी
शर्तों पे शदाकत थी शर्तों पे इनायत थी !

शर्तों पे इबादत थी शर्तों पे बगावत थी
तब सोच कर बता दो कहाँ पे सराफत थी !!
68.
वक्त बदलेगा तो लोग बदल जाएंगे
जो भी बिखरे है संयोग बदल जाएंगे !

अपनी हिकमत अपना अंदाज बनाए रखना
मुंसिफ बदलेगा अभियोग बदल जाएंगे !!
69.
तुम्हारे ग्यान की सीमा हमारे ग्यान की सीमा
कभी निश्चित करेगी अंत: परिणाम की सीमा !

तुम कितने तेज चलते हो हम कितने तेज है चलते
बताएगी हमे पहुँचेगी जब अंजाम की सीमा !!
70.
अभिव्यक्ति मे तुम शब्दों के हदों को भूल जाते हो
कहां पर हो खड़े अपनी जदों को भूल जाते हो !

कहो तो हम तुम्हें बतलाएं मर्यादा सवालों की
हमे कहते हो पर तुम खुद पदों को भूल जाते हो !!
71.
मन मधुरमय राग प्रेम अविरक्ति है
स्नेह सुधा रस की भी तो अभिव्यक्ति है |

वह कौन जो जीवन में श्रृंगारविरक्त हुआ,
तप योग साधनालीन में भी आसक्ति है ||
72.
हमे ना देख पाए तो तमाशा कर रहे है लोग
हमे देखें अगर तो क्यों हताशा कर रहे है लोग !

हमारे साथ चल सकते नही गलती क्या हमारी
हम उम्दा है यही गम है निराशा कर रहे है लोग !!
73.
करे जो माँ की पूजा वो सदा आबाद रहते है
जो हमसे दुश्मनी करते सदा बरबाद रहते है !

मुझे गम कुछ नही लड़कर मरे जो देश की खातिर
मै भारत माँ का बेटा हूँ मुझे आजाद कहते है !!
75.
सावन आया सावन आया प्रिय तुम भी अब आ जाओ
तृषित कामना जगी हृदय मे अब तो दरश दिखा जाओ !
तन भीगा मन भीगा नही हरि दृष्टि पड़ी न इस तन पर
दाह भरा उर शीतल कर दो युग की प्यास बुझा जओ !!
76.
जहां शुकूं नही एक पल वहां पर रोज जीना है
अश्कों का जहर बनना यहां पर रोज पीना है !

यहां लोगों ने हमसे बेवजह पाली अदावत है
यहां पर चाक दामन होते रहना और सीना है !!
77.
ज निद्रा अवसान क्रिया चली वायु अनुकूल
ध्यान ग्यान उत्पति कर कर निष्चेतन शूल !

मानव तू मानवता को गया भाँति किस भूल
लोभ मोह मद क्रोध सदा रहे पाप के मूल !!
78.
नेत्र खुले अधखुले चेतना भी सोई सी लगती है
भाव भंगिमा शुन्य बनी दुनियां खोई सी लगती है !

किसे जगाते मन मलीन मतिहीन तुम्हें जग जान लिया
अभिग्यानी सब द्वार बंद किसने सत का संधान किया !!
79.
हमारा देश हर एक खेल मे हारा तो क्या गम है
कब्बडी मे हरा कर के बताएं किसमे ये दम है !

टांगे खीच कर हम कितनो को पीछे धकेले है
हमे क्या फर्क पड़ता इससे कोई आँख जो नम है !!
80.
हटो अब बदलियों कि तुम जरा सूरज निकलने दो
हवाओं को भी बहने दो परिंदों को चहकने दो !

उजालों के बिना भटकेगी दुनियां राह की खातिर
जरा धरती को तपने दो जरा गुलशन महकने दो!!
81.
मै मिट्टी तुम स्वर्ण रचित हो अपना कोई मेल कहा
सच को सच माने जग ऐसा होता कोई खेल कहा

आँख उठा कर नेताओं को जरा गौर से देखो तुम
कहां होते सफल परिश्रमी अनपढ होता फेल कहा!!
82.
सफीने मे फँसी कश्ती मगर हम हार क्यों बैठे
लहर उठती है मुश्किल तो उठे बेजार क्यों बैठे!

किनारे मिल ही जाते है उन्हें जो हौसले करते
है जब तक जिन्दगी लड़ते रहें बेकार क्यों बैठे !!
83.
है रीत पुरानी अनुदेशक अनुपालक के संबंधो का
जन मानस के उन्नयन और उन्मादों के अनुबंधों का !

जिसके कर धर चलना सीखे वह नही भिन्न परमेश्वर से
यह पृष्ठभूमि है मातु पिता गुरु से पाए उपबंधो का !!
84.
हिन्दू न मुसलमान हिन्दुस्तान की सोचों
सोचो जरा अहले वतन की आन की सोचों |

जिसने भी है बलिदान किया बावला न था
महफूज रक्खो देश अपने जान की सोचों ||
85.
मतिहीन नादानियों पर फितरे बना रहे
आतंक के साये में हो शैतान. की सोचों |

दुशमन हजारों आड़ में है रहनुमाई. के
नेता बने फिरते है इन हैवान की सोचों ||
86.
है तुम्हें धिक्कार पापी बाज भी आया करो
मान लो कहना मेरा तुम वक्त मत जाया करो!

मातृ – भूमि से यहां परहेज है तुमको अगर
जा कही बस जा मुख अपना न दिखाया करो!!
87.

गीत वंदे – मातरम गाने से तुम घबरा गए
देश भक्ति ढोंग तुम हमसे न जताया करो!

शर्म हो बाकी अगर दिल के किसी कोने मे तो
चुल्लू भर पानी में जाकर डूब मर जाया करो !!
88.
तो सरफिरे है आग ही लगा देंगे
पाक नापाक का नामो निशां मिटा देंगे |

हमें ना खौफ कोई तोप या संगीनों का
लडे तो ईंट से फिर ईंट ही बजा देंगे ||
90.
हमे भी है ये गम कि हम तुमसे जुदा है
महज हम आदमी है और तू खुदा है !

बडे मशहूर थे हम बडी चर्चा थी अपनी
मगर ये क्या जगह है यहां हम गुमशुदा है !!
91.
निर्दोषों की गर्दन काटे करे कामना खुशिहाली की
स्वयं लगा कर आग बाग मे करे याचना हरियाली की !

भारत के दक्षिण नरेशों के भी दान यश हमने देखे
पाप फलित होने आया तो रोना रोते बदहाली की !!
92.
वो मेरे ख्वाब गढती है मै उसके ख्वाब गढता हूँ
कभी बढ़ती न वो आगे कभी मै भी न बढ़ता हूँ !

कभी शम्मा जला कर ढूंढती फिरती मुझी को वो
कभी मै देख कर उसको खुदी परवान चढ़ता हूँ !!
93.
चढ़े एक और शब्दों की बली मेरी सियाही से
कलम रोके मेरी शायद नावाजिब उगाही से !

सियासत मे जिन्हें भगवान भी मोहरा नजर आया
हमे भी देखना कैसे वो बच पाते तबाही से!!
94.
आ जाओ चलो चले के खता कर लिया जाए
थोड़ा जी लिया जाए थोड़ा मर लिया जाए !

मुहब्बत है हमे ये जताना है जमाने को
कही खुले मे चलकर मुंह काला कर लिया जाए!!
95.
बदगूमानीयत में लोग बहके जा रहे है
किसी को इल्म तक नही कहाँ जा रहे है !

फना मतिहीन है अब गैरतों की तकरीरें
हमाम में सभी नंगे तो अब नहा रहे है !!
96.
ऐसे ही अपने हुस्न को जाया न करो तुम
कान्हा से मिलने यमुना आया न करो तुम !

तुम्हारे एक इशारे पर वो आ जाएंगे दौडे
राधा यूं सबके सामने बुलाया न करो तुम !!
97.
प्रसव मे है मजा कितना या उसमे दर्द कैसा है
चला मखमल पे जो वो क्या बताए दर्द कैसा है !

जिन्हें सोने की थाली मे दिए पकवान जाते है
उन्हें क्या है खबर कि पेट भी बेदर्द कैसा है !!
98.
मुझे उनसे कभी शुकून हो ये हो नही सकता
सदा ही एक सा जुनून हो ये हो नही सकता !

मै उस पर जाँ लुटा दूँगा यकीं उसको नही शायद
कभी वो भी मेरे मुमकून हो ये हो नही सकता !!
99.
इस तरह से भी होली मनाया न करो तुम
सबको ही अपने घर में बुलाया न करो तुम !

तुम्हें रंग खेलना है तो हमसे ही खेलना
किसी और को यूं रंग लगाया ना करो तुम !!
100.
हम खून बहाते जाते है तुम पानी इसे समझते हो
हम दर्द बयां करते है तुम कहानी इसे समझते हो |
अपराध को देते संरक्षण माँ का आँचल मैला करते
हम जब जब राह दिखाते है नादानी इसे समझते हो ||
101.
नजर में कत्ल का मंजर उतारा जा नही सकता
लगी हो जान की बाजी तो हारा जा नही सकता !

कोई कितना बडा भी हो सपेरा पर यही सच है
छुपे आस्तीन के सापों को मारा जा नही सकता !!
102.
लंबी दौड के घोड़ों को जिसने बांध रखा है
वही गदहों को आरक्षण दिया आबाद रखा है !

मगर भूले नही वो लोग जिसने मुफ्त मे पाई
इन्ही लोगों मिलकर देश कर बरबाद रखा है !!
103.

कवि कुल के कुछ दीप बुझे है
रुदन मचा अवनि अंबर !
मलयानिल स्तब्ध ठिठक कर
देख रहा यह दृश्य मगर !!

धरा विदीर्ण वक्षस्थल पर
रख निष्प्राण देह विलाप करे !
टूटने को आतुर है व्योम
मन कौन करे गढ कर प्रस्तर !!
104.
सिर से ऊपर निकले छंद
समझे कौन मती से मंद !

मिथ्याचार से समय नही
किसको क्या है मत्त गयंद!!

प्रस्तर पर कर शर प्रहार
रहा सदा निश्चल निर्द्वंद !

किंकर्तव्यविमूढ बना है
देख द्रवित उर का आनंद!!
105,
अधरों से गंगा बहती मै जनम जनम की प्यास लिये
तुम चलती धैर्य धाराओं सी मै थका हुआ हताश प्रिये !

एक बूंद भी मिल जाए पावन उर दावानल की आग बुझे
मै सुखी हुई मरुभूमि प्रिये सदियों सदियों का त्रास लिए !!
106.
बस्तर की छाती को छलनी कर बार बार वो देते है
हम हाथ पे हाथ धरे बैठे कुछ सहानुभूति दे देते है !

जिन माओं की गोदी सूनी जिस मांग का है सिंदूर छिना
उनसे तो कभी पूछो जाकर किस तरह वो फिर जी लेतेहैं !!
107.
तुम सियासत जानते हो हम मुहब्बत जानते है
तुम पराया कर दिए हम तुमको अपना मानते है !

तुम बिखेरो लाख कांटे हम बिखेरे खुशबू ए गुल
आप शायद फूल की फ़ितरत नही पहचानते है !!
108.
धूप बख्शा आपने कोई गिला हमको नही
आपकी रंगत रहे हम शामियाना तानते है !

लाख कमियां आपने मेरी बताई है मगर
आपकी अच्छाइयों को हम सदा बखानते है !!
109.
दहशतों का सिलसिला जारी है बदस्तूर
हो गए हैं लोग सच्चाई से कोसो दूर !

अपने जद मे आग न लग जाए सबको है फिकर
है बदल कर रूप जीने को सभी मजबूर !!
110.
क्यू हुए अपनी डगर से फिर रहा अंजान है
हिन्द की धरती यहां हर व्याध का निदान है !

क्या हुआ जो शक्ति लगने से हुए मूर्छित लखन
बन रहो निर्भय कि रक्षक राम दूत हनुमान है !!
111.
कहा जाए जो समझाने को वो संबोध होते है
मगर दुहराए जो गलती वही निर्बोध होते है !

करो कुछ भी मगर जो बात ना माने किसी हद पर
पकड़ कर ठोक दो उसको वो आदरकोद होते है !!
112.
बड़े जो लोग है उनमें बड़ी दूरी भी रहती है
उन्हें खुद को अलग रखने की मजबूरी भी रहती है !

समाजों के रिवाजों से उन्हें मतलब नही कोई
भरी उनके दिमागों मे ये मगरूरी भी रहती है !!
113.
खुद से खुद का बोध हुआ
सार्थक यह अनुरोध हुआ !

जीवन मे जीवन पाया
गुढ रहस्य का शोध हुआ !!
114.
मुझसे बेहतर मुझे कोई भी जान लेता है
खुद मुकरता और मुझसे जुबान लेता है !

मुझे फुरसत ही नही अपने रंजो गम से कभी
फिर भी हर बात पर वो आँख तान लेता है !!
115.
हमारे देश की मिट्टी मे कुछ तो बात ऐसी है
यहां रहते हैं योगी भी यहां रहता ओवैसी है !

कोई देशभक्त अपनी देशभक्ति का दीवाना है
कोई है देश का दुश्मन मिली फ़ितरत ही ऐसी है !!
116.
कोई साबूत मांगे और कोई शहीद होता है
किए जाते करम जिसको मिली सौगात जैसी है !

जिसने सोहरते पाई विरासत मे वो क्या जाने
चढेंगे चोटियां जिसको मिली औकात जैसी है !!
117.
जीवन मे जीवन का मूल नही समझा तू अगर
समझो जीवन संपूर्ण अकारथ बीत गया !

हस्त पुष्प पराग परमार्थ योग सिद्धियां मगर
समझ सका ना मूरख मन कर रीता था कर रीत गया !!
118.
जबां पर लग गया ताला चलो अब हम न बोलेंगे
परेशां हो अगर कह दो न कोई राज खोलेंगे !

सियासत ने हमे हर बात पर हर दम सताया है
हमे आदत है रोने की चलो आगे भी रो लेंगे !!
119.
मिशालें दी जहां जाती नसीहत की जहां जाती
वहां धोते रहे है दाग हम आगे भी धो लेंगे !

दमन करना तेरी फ़ितरत करा ले सर कलम मेरा
बहुत ढोए है पापों को इसे आगे भी ढो लेंगे !!
120.
अगर महफिल मे हम ना हो तो कहते है नवाजिश है
मगर मौजूद होते है तो कहते है कि साजिश है !

अगर जीते नही तो कहते है जीता नही है क्यो
अगर मरते है तो कहते मेरे मरने मे साजिश है !!
121.
वो मुझसे बोलते है बोलने मे क्या है बोलना
जिन्होंने बोलने से पहले सीखा है न तोलना !

हमे सिखलाते पैतरे जो उनकी अपनी फ़ितरत है
मगर फिर बाद मे कहते न कोई राज खोलना !!
122.
जब तक तीखे शब्द सुने ना तब तक कान बने बहरे
जब तक बात न लगे हृदय मे आँखें तब तक अँधी है !

सच बोलो और गला गंवाओ कोई सुनता नही यहाँ
न्याय मूर्ति भी कैसे देखे आँखों पर पट्टी बंधी है !!
123.
अगर सुनाना है लोगों को सूई चूभोनी पड़ती है
जब तक खुद को दर्द न हो वेदना कहां उमडती है !

कह दो अपनी बात जिधर सबकी भौ उधर अकड़ती है
सबका अपना स्वार्थ है खींचे इसी पे दुनियां लड़ती है !!
124.
शर्तों पे मुहब्बत थी शर्तों पे अदावत थी
शर्तों पे शदाकत थी शर्तों पे इनायत थी !

शर्तों पे इबादत थी शर्तों पे बगावत थी
तब सोच कर बता दो कहाँ पे सराफत थी !!
125.
वक्त बदलेगा तो लोग बदल जाएंगे
जो भी बिखरे है संयोग बदल जाएंगे !

अपनी हिकमत अपना अंदाज बनाए रखना
मुंसिफ बदलेगा अभियोग बदल जाएंगे !!
126.
तुम्हारे ग्यान की सीमा हमारे ग्यान की सीमा
कभी निश्चित करेगी अंत: परिणाम की सीमा !

तुम कितने तेज चलते हो हम कितने तेज है चलते
बताएगी हमे पहुँचेगी जब अंजाम की सीमा !!
127.
अभिव्यक्ति मे तुम शब्दों के हदों को भूल जाते हो
कहां पर हो खड़े अपनी जदों को भूल जाते हो !

कहो तो हम तुम्हें बतलाएं मर्यादा सवालों की
हमे कहते हो पर तुम खुद पदों को भूल जाते हो !!
128.
मन मधुरमय राग प्रेम अविरक्ति है
स्नेह सुधा रस की भी तो अभिव्यक्ति है |

वह कौन जो जीवन में श्रृंगारविरक्त हुआ,
तप योग साधनालीन में भी आसक्ति है ||
129.
हमे ना देख पाए तो तमाशा कर रहे है लोग
हमे देखें अगर तो क्यों हताशा कर रहे है लोग !

हमारे साथ चल सकते नही गलती क्या हमारी
हम उम्दा है यही गम है निराशा कर रहे है लोग !!
130.
करे जो माँ की पूजा वो सदा आबाद रहते है
जो हमसे दुश्मनी करते सदा बरबाद रहते है !

मुझे गम कुछ नही लड़कर मरे जो देश की खातिर
मै भारत माँ का बेटा हूँ मुझे आजाद कहते है !!
131.
तुम्हें सोने से कब फुरसत हम जगने से कब खाली
चलो बस हो गई चर्चा न तुम खाली न हम खाली !

तुम्हें खुशियां मिली तो तुमको खुश होने से कब फुरसत
मुझे गम है मिले तो हम भी अपने गम से कब खाली !!
132.
सावन आया सावन आया प्रिय तुम भी अब आ जाओ
तृषित कामना जगी हृदय मे अब तो दरश दिखा जाओ !

तन भीगा मन भीगा नही हरि दृष्टि पड़ी न इस तन पर
दाह भरा उर शीतल कर दो युग की प्यास बुझा जओ !!
133.
जहां शुकूं नही एक पल वहां पर रोज जीना है
अश्कों का जहर बनना यहां पर रोज पीना है !

यहां लोगों ने हमसे बेवजह पाली अदावत है
यहां पर चाक दामन होते रहना और सीना है !!
134.
ज निद्रा अवसान क्रिया चली वायु अनुकूल
ध्यान ग्यान उत्पति कर कर निष्चेतन शूल !

मानव तू मानवता को गया भाँति किस भूल
लोभ मोह मद क्रोध सदा रहे पाप के मूल !!
135.
नेत्र खुले अधखुले चेतना भी सोई सी लगती है
भाव भंगिमा शुन्य बनी दुनियां खोई सी लगती है !

किसे जगाते मन मलीन मतिहीन तुम्हें जग जान लिया
अभिग्यानी सब द्वार बंद किसने सत का संधान किया !!
136.
हमारा देश हर एक खेल मे हारा तो क्या गम है
कब्बडी मे हरा कर के बताएं किसमे ये दम है !

टांगे खीच कर हम कितनो को पीछे धकेले है
हमे क्या फर्क पड़ता इससे कोई आँख जो नम है !!
137.
हटो अब बदलियों कि तुम जरा सूरज निकलने दो
हवाओं को भी बहने दो परिंदों को चहकने दो !

उजालों के बिना भटकेगी दुनियां राह की खातिर
जरा धरती को तपने दो जरा गुलशन महकने दो!!
138.
मै मिट्टी तुम स्वर्ण रचित हो अपना कोई मेल कहा
सच को सच माने जग ऐसा होता कोई खेल कहा

आँख उठा कर नेताओं को जरा गौर से देखो तुम
कहां होते सफल परिश्रमी अनपढ होता फेल कहा!!
139.
सफीने मे फँसी कश्ती मगर हम हार क्यों बैठे
लहर उठती है मुश्किल तो उठे बेजार क्यों बैठे!

किनारे मिल ही जाते है उन्हें जो हौसले करते
है जब तक जिन्दगी लड़ते रहें बेकार क्यों बैठे !!
140.
है रीत पुरानी अनुदेशक अनुपालक के संबंधो का
जन मानस के उन्नयन और उन्मादों के अनुबंधों का !

जिसके कर धर चलना सीखे वह नही भिन्न परमेश्वर से
यह पृष्ठभूमि है मातु पिता गुरु से पाए उपबंधो का !!
141.
हिन्दू न मुसलमान हिन्दुस्तान की सोचों
सोचो जरा अहले वतन की आन की सोचों |

जिसने भी है बलिदान किया बावला न था
महफूज रक्खो देश अपने जान की सोचों ||
142.
मतिहीन नादानियों पर फितरे बना रहे
आतंक के साये में हो शैतान. की सोचों |

दुशमन हजारों आड़ में है रहनुमाई. के
नेता बने फिरते है इन हैवान की सोचों ||
143.
है तुम्हें धिक्कार पापी बाज भी आया करो
मान लो कहना मेरा तुम वक्त मत जाया करो!

मातृ – भूमि से यहां परहेज है तुमको अगर
जा कही बस जा मुख अपना न दिखाया करो!!
144.
गीत वंदे – मातरम गाने से तुम घबरा गए
देश भक्ति ढोंग तुम हमसे न जताया करो!
शर्म हो बाकी अगर दिल के किसी कोने मे तो
चुल्लू भर पानी में जाकर डूब मर जाया करो !!
145.
फिरे तो सरफिरे है आग ही लगा देंगे
पाक नापाक का नामो निशां मिटा देंगे |

हमें ना खौफ कोई तोप या संगीनों का
लडे तो ईंट से फिर ईंट ही बजा देंगे ||
146.
हमे भी है ये गम कि हम तुमसे जुदा है
महज हम आदमी है और तू खुदा है !
बडे मशहूर थे हम बडी चर्चा थी अपनी
मगर ये क्या जगह है यहां हम गुमशुदा है !!
147.
निर्दोषों की गर्दन काटे करे कामना खुशिहाली की
स्वयं लगा कर आग बाग मे करे याचना हरियाली की !

भारत के दक्षिण नरेशों के भी दान यश हमने देखे
पाप फलित होने आया तो रोना रोते बदहाली की !!
148.
वो मेरे ख्वाब गढती है मै उसके ख्वाब गढता हूँ
कभी बढ़ती न वो आगे कभी मै भी न बढ़ता हूँ !

कभी शम्मा जला कर ढूंढती फिरती मुझी को वो
कभी मै देख कर उसको खुदी परवान चढ़ता हूँ !!
149.
चढ़े एक और शब्दों की बली मेरी सियाही से*
कलम रोके मेरी शायद नावाजिब उगाही से !

सियासत मे जिन्हें भगवान भी मोहरा नजर आया
हमे भी देखना कैसे वो बच पाते तबाही से !!
150.

*मुक्तक*

*महज धागा नही है बांधती संसार है बहना*
*ये राखी भाइयों के वास्ते एक प्यार है बहना !*

*इन्हें रखना सदा खुश इनसे ही घर मे बनी रौनक*
*मिली है ईश से वरदान व उपहार है बहना !!*

मनोज उपाध्याय मतिहीन…
अयोध्या नगर महासमुंद रायपुर

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मतिहीन

मनोज उपाध्याय मतिहीन, अयोध्या नगर महासमुंद,छ.ग. पिन 493445

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