…ट्रेन का सफ़र…
घर जाने की खुशी
और ऊपर से हमउम्र के
साथ उनका और हमरा
शरारते सब अजब का मंजर होता है
ऐसा प्रतीत होता है मानों
की मैं खुद को बचा ऐसा प्रतीत
अनुभूति होती हैं ऐसा
लगता है कि मानों मैं मासूम से
बच्चे भांति महशूश करता हूँ
ऊपर से ट्रेन में बक बक
कही राजनीति के मुद्दे
कही बीमारियों का जिक्र तो
कही जीवन जीने का जिक्र
तो कही सीट पाने की ललक
में एक दूसरे के साथ
लड़ना झगरणा ऐसा लगता है
मानों की हिंदुस्तान और
पाकिस्तान का बॉडर हो
या लड़ने का अखड़ा बन
गया हो पांच घंटे का सफ़र में
सब अक्सर देखने को
मिलता है ऐसा लगता है मानों हमलोग
आम जनता के लिए किसी
राज्य सभा और विधानसभा
से कम नही होता है और
देश के नवजवान छुटियाँ
बिताने के आते हैं उन्हें इज्जत
तो करना दूर उन्हें ढंग से
कोई खड़ा भी नही होने देता है
जो हम सब देशवाशियों के
ख़ातिर बॉडर पर अपने
परिवार और बच्चों से दूर रहते हैं
उनका भी हम ख्याल न रखते हुए,
झूठे शान में अहम में रहते हैं ये है
ट्रेन का सफ़र और हगर्व से कहते हैं
कि हम भारतीय हैं और संस्कृति की बात करते हैं
जहां के छोटे छोटे बच्चे
बुजुर्ग वर्ग से खैनी और गुटका की
मांग करते हैं और उन्हें
सीट तो देना दूर आदर भाव देना
भूलते जा रहें हैं! हम गर्व से
कहते हैं हम भारत के लोग
संस्कृति के लिए जाने जाते हैं!
जहां भारत के मुखिया
देश को डिजिटल बनाने
को आतुल है और बुलेंट ट्रेन
चलाने की बातें करते हैं!
जहां एक तरफ लोकल ट्रेन काये हाल है
और यहाँ का लोकल ट्रेन
का हाल देखकर दिल बैठ जाता है
करण की यहाँ की
यूआ वर्ग ट्रेन में महिलाओं
का लिहाज करते हैं
न इज्जत करते हैं!
आज हमारे देश के
मुखिया को जमीन से जुड़ के
देखे तो उन्हे प्रतीत होगा
की अभी अपना देश न
डिजिटल बनने के काबिल है
न बुलेंट ट्रेन चलने के
लिए मेरे देश तटपर है?
ये है मेरे देश का कड़वा सच!
प्रेम प्रकाश
26/06/2018

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *