मैं हूँ समाज!

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मैं हूँ समाज!

मैं हूँ समाज!

मैं समाज की नाम और प्रतिष्ठा हूँ
मैं एक ऐसा समाज का निर्माण करता हूँ
मैं ना किसी को भोजन न
कपड़े लत्ते भेंट करता हूँ!
मगर मेरे इस नाम के लिए
पूरे संसार के लिए मैं
हितकारी और इज्जत का
एक शान और गरिमा के
लिए मैं हूँ समाज!
मैं एक समाजकारी
और सभी ग्रामवासियों
को बांधे रखती हूँ
किसी के लिए मैं
रूतबा और किसी
के लिए तिरस्कार हूँ
किसी के लिए मैं
मान एवं प्रतिष्ठा हूँ मैं!
किसी को रोटी नही दिया,
न किसी के मैं धन और
शौहरत का सबब बना
फिर भी हमपे लोग
संदियों से निछवार रहते हैं!
जो हमसे निकाले गए!
उनका विवश देख कर
मुझे तरस आता हैं!
मैं कुछ कर नही सकता हूँ
लोगों का बनाया हूँ समाज
लोगों के लिए मैं एक मिसाल हूँ
मेरे बिना न किसी का सामूहिक
कार्य किया जा सकता हैं
हालांकि मैं एक नाम मात्र हूँ!
मैं खुद समझ नही पाया की
मुझे इतना तबज्जू क्यों दिया जाता हैं!
जो आज तक ना मैं समाज
को दे पाया न किसी गरीब
के लिए भूख मिटाने का
रोटी बन पाया न किसी
समाज के लिए शिक्षा
के करण बन पाया हूँ!
आत्महत्या का कारण हूँ!
प्रेम और दुश्मनी का कारण हूँ!
आश्चर्यजनक बातें हैं!
जिनके लिए मैं बनाया गया हूँ!
मैं उन्हें न खुश रख पाता हूँ!
न कभी दर्द में शामिल हो पाता हूँ!
मैं हूँ अभागा समाज!
मैं गर्व से कहता हूं मैं समाज!
मैं हूँ समाज!
प्रेम प्रकाश
27/08/2018

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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