मेरी ज़िंदगी सुबह की ऊषा की लाली बन गई है
खिलते हुए फूल की ख़ुशबू उसे मिल गई है
मेरी ज़िंदगी बगीचे की बहार बन गई है
बारिश की फुहार बन गई है
धरती पर आई हरियाली बन गई है
मेरी ज़िंदगी बहते हुए झरने की धार बन गई है
क्योंकि मुझे एक प्यारी राजकुमारी मिल गई है ।

मेरा घर आज खुशियों से महक रहा है
हर कोना जैसे चहक रहा है
मेरे परिवार को खुशियों की चाबी मिल गई है
क्योंकि मुझे एक प्यारी राजकुमारी मिल गई है

(यहां कविता में विरोधाभास आता है)

लोग क्यों अपने घर को नरक बनाते हैं
बेटी लाकर उसे बहू बनाते हैं
खुद भी घुटते हैं और उसे भी रुलाते हैं
दो परिवार एक ही आग में जल जाते हैं ।

अपने दिल को बड़ा कर के तो देखो
एक बार उसे कलेजे से लगाकर तो देखो
प्यार भरा हाथ सर पर फिरा कर तो देखो
बेटी को बेटी बना कर तो देखो ।

फिर तुम्हें भी खुशियों की चाबी मिल जायेगी
जब बेटी बेटी ही कहलाएगी
जब बेटी ,बेटी ही रह पायेगी ।

दिया है अपने दिल का टुकड़ा
तुम्हें तुम्हारा घर बसाने को
महकने दो उसे खिलने दो उसे ।

न भूलो कल तुम्हारा भी तो आयेगा
तुम्हारे दिल का टुकड़ा भी तो किसी के घर को जायेगा
करनी है शुरुआत तो फ़िर आज से ही कर दो
बेटी को बेटी ही रहने दो बहू का नाम ही मत दो ।

.रत्ना पांडे

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